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तीर्थंकर देव एक ही भाषा में देते हैं प्रवचन:स्नेहयशा
श्रीकुशलनिपुणा अतिथि गृह में जैन साध्वी स्नेहयशा श्रीजी मसा ने रविवार को सिद्ध चक्र की साधना नवपद की आराधना 6 अक्टूबर से शुरू होने वाली है। उन्होंने कहा कि राजगृही नगरी में परमात्मा महावीर का जल पदार्पण हुआ, देवो तो देवो ने समवशरण की रचना की। भगवान समवशरण में विराजमान होकर योजना गामिनी देशना शुरू किया। तीर्थंकर देव एक ही भाषा में देशना (प्रवचन) देते हैं, परंतु परमात्मा की अपूर्व की कृपा की शमवरण में प्रभु के प्रवचन को प्रत्येक जीव अपनी-अपनी भाषा में सुनते समझते हैं।
उन्होंने कहा कि जिस तरह संसद में वक्ता जब भाषण देते हैं तो वह अपनी एक ही भाषा में बोलता है, परंतु दूरसंचार वाले टेक्नालाजी का उपयोग कर उसे अलग-अलग भाषा में ट्रांसलेट कर लोगों तक पहुंचाते हैं। यहां टेक्नालाजी का कमाल है, जबकि वहां ये सब भगवान का अतिशय है। महासती ने कहा कि शमवशरण में तीन गढ़ होते हैं।
पहला गढ़ सबसे बड़ा होता है। जिसमें आम बोलचाल की भाषा में कटे तो वहां पार्किंग की व्यवस्था होती थी। जिस तरह समाज संघ में होने वाले किसी भी कार्यक्रम स्थल के बाहर पहले पार्किंग व्यवस्था होती है, ठीक उसी प्रकार शमवशरण में परमात्मा की देशना सुनने के लिए देव-देवियां अपने-अपने साधनों से आते थे, उन साधनों को पहले गढ़ में रखते थे तथा दूसरे गढ़ में तिर्यच प्राणी देशना सुनते थे, तीसरे गढ़ में बारह पर्षदा होती है।
शमवशरण के बीचों बीच एक अशोक वृक्ष होता है। परमात्मा उस वृक्ष के पूर्व दिशा में बैठते है और बाकी तीनों दिशा में परमात्मा की प्रतिकृति होती है। भगवान देशना देकर जल सिंहासन से उठते है, तब उसके बाद गणधर भगवंत देशना देते हैं। गणधर भगवंत अपनी देशना में नवपद की महिमा का वर्णन करते नवपद आराधना श्रीपाल और मयणा ने की थी। उसी प्रकार की साधना आराधना हमें करना चाहिए।
गौतम स्वामी के गुणों पर भी डाला प्रकाश
महासतीने कहा कि गौतम स्वामी ने अष्टापद में 150 तापसों को दीक्षा दी और पूरे 150 तापसों को खीर सेवन करते-करते केवल ज्ञान प्राप्त हो गया। सिर्फ खीर सेवन करने से ही केवल ज्ञान नहीं होता, अपितु भाव धारा में डूबने और कर्मों का क्षयोपशम होने से केवल ज्ञान हो गया। भगवान के प्रति विनय गुण, समर्पण भाव होने के कारण नवपद की महिमा का वर्णन करते हुए सर्वप्रथम गौतम स्वामी के गुणों का वर्णन बखान किया जाता है। उनके विनय गुण और सम