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व्यक्ति के विवेक को खा जाता है क्रोध: स्नेहयशा

7 वर्ष पहले
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श्रीकुशलनिपुणा अतिथि गृह में जैन साध्वी स्नेहयशा मसा ने मंगलवार को प्रवचन देते कहा कि क्रोध जब व्यक्ति के जीवन में प्रवेश करता है तब क्रोधी व्यक्ति पागल बन जाता है, उसका विनय विवेक खत्म हो जाता है। क्रोध व्यक्ति के विवेक को खा जाता है।

सद्गुणों का नाश होता है। सद्गुणों के नाश होते ही मानवता खत्म हो जाती है और वह राक्षसों जैसी प्रवृत्ति करने लग जाता है। महासती ने क्रोध आने के कारण को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब अपेक्षा उपेक्षा में बदल जाती है तो व्यक्ति को क्रोध आता है। क्रोध दिमाग का पागलपन है, जो व्यक्ति के भीतर होता है। क्रोध जब भी आता है तब पता चल जाता है कि मुझे क्रोध रहा है। क्रोध को वीआईपी गेस्ट कहा गया है। एक विशिष्ट अतिथि है जो इन्वीटेशन देने पर ही आता है। जिस प्रकार पानी में कंकड़ डालने पर समूचे पानी में तरंगे या हलचल हो जाती है, ठीक इसी तरह निमित्त मिलने पर कुछ ऐसा प्रसंग बन जाता है कि व्यक्ति को क्रोध जाता है। क्रोध आने पर उसका स्वरूप बहुत ही खतरनाक होता है। आंखें लाल पीली हो जाती है। होंठ कांपने लगते हैं। शरीर गरम हो जाता है। आवाज में तेजी जाती है। शब्दों पर अंकुश नहीं रहता। क्रोध के परिणाम स्वरुप सद्गुणों का नाश होता है। संबंधों में कटूता दरारें जाती है। भाई-भाई का पति-प|ी का, देवरानी-जेठानी का सास-बहू का नहीं जमता। सबसे बड़ा नुकसान संबंधों के साथ-साथ शरीर का भी क्रोध मुर्खता से शुरू होता है और पछतावे पर खत्म। जो क्रोध करता है वह मुर्ख ही है।

क्रोध का जब नशा उतर जाता है, तब क्रोधी पछताता है। परंतु क्रोध की दशा में जो काम बिगड़ जाता है, वह कभी नहीं सुधर सकता है। क्रोधी व्यक्ति की दशा में जो काम बिगड़ जाता है वह कभी नहीं सुधर सकता है। क्रोधी व्यक्ति हित अहित सही गलत का विचार करने वाली बुद्धि को खो देता है। आत्मा के मूल स्वरुप को जानने समझने के लिए स्वभाव दशा में आता जरुरी है। अहंकार को नष्ट करना होगा। अहंकार को गलाने के लिए प्रभु की आज्ञा के अनुसार जीवन जीना होगा।

तीन दिवसीय उपवास कल से

व्यवस्था समिति के आशीष बाफना ने बताया कि 18 सितंबर से महिलाओं बालिकाओं के लिए चंदनबाला तेले तप (तीन दिन का उपवास) की अराधना शुरू होगी, जो 21 सितंबर को उड़द के बनकूले को साध्वी वृंदों को बहराने (देने) के साथ समापन होगा। इस दिवस आराधक मात्र उड़द के बनकूले को ही ग्रहण कर