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गाजर घास प्रभावित करती है फसल उत्पादन क्षमता
महर्षिदयानंद आंग्लवैदिक उमावि राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई द्वारा गाजर घास उन्मूलन विषय पर एक दिवसीय सेमीनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम अधिकारी देवेन्द्र चतुर्वेदी ने बताया कि 22 एवं 23 सितंबर को राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई द्वारा संजय नगर के आसपास गाजर घास की सफाई करने जन जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।
इसके पूर्व गाजर घास की पहचान एवं उसके दुष्परिणामों को जानने यह सेमीनार आयोजित किया गया। डा रश्मि बंजारे ने कहा भारत में सबसे पहले गेंहू गाजर घास की फसल के साथ विदेशों से महाराष्ट्र के इलाकों में पहुंचा फिर धीरे धीरे पूरे भारत वर्ष में फैल गया। गाजर घास किसी भी स्थान पर पनप जाता है लेकिन नमी वाले स्थानों में ज्यादा पाया जाता है। गाजर की तरह इसकी पत्तियॉं होने के कारण इसका नाम गाजर घास पड़ा। मुख्य अतिथि डा प्रफुल्ल रहांगडाले ने बताया गाजर घास किसी भी फसल के साथ आसानी से पनपता है तथा इसमें उपस्थित टाक्सिन के कारण फसल के उत्पादन को कम करता है। गाजर घास को जड़ से उखाड़ना जरूरी है। इसके लिये युवा वर्ग को सामने आना होगा, साथ ही इसके संपर्क में आने से चर्मरोग फोडें फुंसी तथा जब इनके फूल झड़ते हैं तो ये मनुष्य में सांस के जरियें फेफडो में पहुंचकर दमा जैसी बीमारी को जन्म देता है। विभिन्न विद्यालयों से आए स्वयं सेवकों द्वारा किये गए प्रश्नों का भी कृषि वैज्ञानिकों ने जवाब दिया। इस अवसर पर मुस्तकीम अंसारी, सुरेश मिश्रा, ज्ञानेश चतुर्वेदी उपस्थित थे। संचालन स्वयं सेवक अतुल एवं संदीप चंदेलकर ने किया। कार्यक्रम में राकेश सिन्हा, खुश्बू, रोली, लीना यादव, देवेश, राज शाही, जयेश सर्फे, पवन ठाकूर, तबस्सुम, खिलेन्द्र, विभा, ओमकुमारी, राजश्री, हरेश रावटे, राहुल, करिश्मा शोरी, धनेश्वरी कुमेटी, ओम प्रकाश जैन आदि ने योगदान दिया।
कांकेर. गाजरघास को लेकर आयोजित किया गया जागरूकता कार्यक्रम।