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जिले के सबसे बड़े अस्पताल में इलाज नहीं, कर रहे रेफर

6 वर्ष पहले
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जिलेके सबसे बड़े कोमलदेव जिला अस्पताल में डाक्टर तथा नर्सों की भारी कमी है। इलाज के लिए आवश्यक संसाधन भी नहीं है। 6 साल पहले करोड़ों की लागत का भवन जरूर बनाया गया, लेकिन सुविधाएं मुहैया नहीं कराई गई। हालत ये है की अस्पताल में मात्र प्राथमिक चिकित्सा की जाती है, शेष सभी बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को धमतरी या रायपुर रेफर कर दिया जा रहा है। जिला मुख्यालय में इलाज नहीं मिल पाने से गरीब तथा मध्यम वर्ग को बहुत ज्यादा परेशानी हो रही है।

जिला अस्पताल में डाक्टरों के 22 पद स्वीकृत हैं, जिसमें से 9 रिक्त पड़े हैं। डाक्टरों की कमी का सर्वाधिक प्रभाव ओपीडी पर पड़ता है। कई बार जब डाक्टर अवकाश पर रहते हैं या प्रशिक्षण, शिविर आदि कार्य से बाहर जाते हैं तो इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों को बेहद असुविधा होती है।

एक ओर डाक्टरों की कमी तो है ही दूसरी ओर जो डाक्टर पदस्थ हैं वे भी ओपीडी में विलंब से पहुंचते हैं जिससे मरीजों को परेशानी होती है। डाक्टरों के समय पर ओपीडी नहीं पहुंचने को लेकर लोगों में बहुत ज्यादा नाराजगी है।

जिला अस्पताल में स्टाफ नर्स के 40 पद स्वीकृत हैं, जिसमें से 18 रिक्त हैं। तीन शिफ्ट में नर्स स्टाफ ड्यूटी देनी होती है। स्टाफ नर्स की कमी के चलते शाम रात के दौरान तो महिला पुरुष वार्ड में एक-एक स्टाफ नर्स ही ड्यूटी देती है। मरीजों की बेहतर ढंग से देखरेख नहीं हो पाती। इंजेक्शन रूम आपात कक्ष ओपीडी में भी स्टाफ नर्स बढ़ाए जाने की जरूरत है। नर्सिंग सिस्टर के दो पद स्वीकृत हैं तथा दोनो ही रिक्त हैं।

^ओपीडी के दौरान डाक्टरों से एमआर के मिलने पर प्रतिबंध लगाया गया है। डाक्टरों को चाहिए की वे ओपीडी के समय एमआर से नहीं मिले। यदि ओपीडी के समय कोई डाक्टर एमआर से मिलते पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। जिला अस्पताल में डाक्टर स्टाफ नर्स का अभाव है जिससे मरीजों का इलाज प्रभावित होता है। कुछ विशेषज्ञ डाक्टरों के अभाव में मरीजों को रेफर करना मजबूरी हो जाती है। कई बार मरीजों को उनके परिजन ही रेफर कराकर ले जाते हैं। -डाआरसी ठाकुर, सिविल सर्जन, जिला अस्पताल कांकेर

सूचना लगी है पर नहीं होती कार्रवाई

अस्पतालप्रशासन ने ओपीडी के दौरान एमआर का डाक्टरों से मिलने पर पूर्णत: प्रतिबंध लगा रखा है। सुबह 8 से दोपहर 1 बजे तथा शाम 5 बजे से 6 बजे तक ओपीडी का समय रहता है जिसमें मरीजों की जांच की जाती है। इस दौरान एमआर को रोकने सभी डाक्टरों के चेंबर के बाहर नोटिस भी चस्पा की गई है जिसमें ओपीडी के दौरान उन्हें मिलने मना किया गया है। इस प्रतिबंध के बावजूद एमआर डाक्टर के चेंबर घुसे रहते हैं तथा रंगे हाथ पकड़े जाने के बाद भी आजतक अस्पताल प्रशासन ने इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की है। इसी का नतीजा है आजतक स्थिति में कोई सुधार नहीं हो सका है तथा मरीज परेशान हैं।

12 साल से बंद है आईसीयू

जिलाअस्पताल में गंभीर मरीजों के लिए 12 वर्ष पूर्व आईसीसीयू शुरू किया गया था। विधिवत शुभारंभ भी किया गया था लेकिन आईसीसीयू में ताला जड़ा हुआ है। चार बेड के आईसीयू में लगे उपकरण पड़े पड़े खराब हो रहे हैं। आईसीसीयू के लिए अलग से डाक्टर नर्स स्टाफ की जरूरत होती है इसके अभाव में आईसीयू बंद पड़ा है। जिला अस्पताल के लिए सिटी स्केन भी तीन वर्ष पहले स्वीकृत हो चुका है लेकिन जब तक रेडियोलाजिस्ट की नियुक्ति नहीं होती सिटी स्केन का उपयोग संभव नहीं है। इसके अभाव में सड़क दुर्घटना के प्राय: मामलों में मरीजों को रेफर करना पड़ता है।

ओपीडी में एमआर के कारण करते हैं इंतजार

अस्पतालप्रशासन द्वारा ओपीडी के दौरान पहुंचने वाले एमआर के रोकथाम के लिए किए गए सारे उपाय बेकार साबित हो रहे हैं। अस्पताल प्रशासन द्वारा इस संबंध में मात्र कार्रवाई करने की बात कही जाती है लेकिन आज तक कार्रवाई होती कभी नहीं दिखी। इसी का नतीजा है कि कई शिकायतों के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है तथा आज भी ओपीडी के समय अधिकांश डाक्टर के चेंबर में एमआर बैठे रहते हैं तथा मरीज बाहर बारी का इंतजार करते नजर आते हैं।

कांकेर. जिले का यह है सबसे बड़ा अस्पताल। जहां सुिवधाएं काफी कम है।