क्या समान नागरिक संहिता जरूरी है?
केंद्र मेंसत्ता हासिल करने के कुछ ही महीने बाद सत्तारूढ़ दल के गोरखपुर से सासंद योगी आदित्यनाथ ने देश में समान नागरिक संहिता लागू करने पर अपनी सरकार से रुख स्पष्ट करने की मांग की। सांसद के दृष्टिकोण से उनकी मांग सही हो सकती है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव के अपने चुनाव घोषणा-पत्र में वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह समान नागरिक संहिता को लागू करेगी। केंद्रीय कानून मंत्री रवीशंकर प्रसाद ने तत्काल प्रतिक्रिया देते हुए यह सही कहा कि नागरिक संहिता की दिशा में ऐसी किसी पहल पर व्यापक विचार-विमर्श जरूरी है।
अब इसमें शायद ही किसी को संदेह हो कि इस मुद्दे पर व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए, खासतौर पर उनमें, जिनका इस फैसले पर बहुत कुछ दांव पर लगा है। हालांकि, सवाल यह है कि कुछ समुदाय के पर्सनल कानून को हटाने के इस फैसले का कई तबकों की ओर से कड़ा विरोध हो सकता है, जिसका सामाजिक सौहार्द पर असर पड़ सकता है। क्या सरकार को इस दिशा में आगे बढ़ने की कोई पहल करनी भी चाहिए? क्या यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर दिए भाषण से संगत होगा, जिसमें सामाजिक सौहार्द पर अत्यधिक जोर दिया गया था?
मुझे वाकई इस बारे में संदेह है कि सरकार मुस्लिम महिलाओं के हित और उनके कल्याण को ध्यान में रखकर समान नागरिक संहिता के लिए पहल करना चाहती है। किसी तबके के कल्याण की चिंता की बजाय इसमें राजनीतिक दृष्टिकोण नजर आता है। अामतौर पर यह समझा जाता है कि ऐसी किसी पहल का हिंदू समर्थन करेंगे, जिससे सत्तारूढ़ दल को अपने पक्ष में बहुसंख्यक समुदाय के वोट लामबंद करने में मदद मिलेगी। दीर्घावधि में इससे उसे चुनावी फायदा मिलेगा।
भाजपा ने हाल में लोकसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की है और इसमें हिंदू मतों की लामबंदी प्रमुख कारक था। ऐसे में क्या पार्टी को यह मुद्दा उठाने की जरूरत है? फिर ऐसा सोचना गलत होगा कि समान नागरिक संहिता लाने के प्रयासों से िहंदू मतों का ध्रुवीकरण होगा, क्योंकि सारे हिंदू इस विचार का समर्थन नहीं करते। हिंदुओं में ऐसे तबके हैं, जो विवाह और संपत्ति के मामले में अल्पसंख्यक समुदाय को स्वतंत्रता देने के विचार का समर्थन करते हैं। समान नागरिक संहिता को संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत रखने में कोई बात तो होगी, जिसके तहत ऐसी किसी नीति को लागू करना सरकार के लिए आवश्यक नह