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शिवेंद्र : राह की बांहों का मुसाफिर

7 वर्ष पहले
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मुंबई के तारदेव इलाके में एयर कंडीशंड मार्केट के पास अरुण चैम्बर्स के सातवें माले पर शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर का दफ्तर है। दशकों पूर्व सन् 1930 के बाद वर्षों में इसी जगह सेंट्रल स्टूडियो होता था जिसमें दरबान की नौकरी से प्रारंभ करके मेहबूब खान एक दिन शिखर फिल्मकार बने। इसी जगह कारदार भी शूटिंग करते थे। इसी इमारत के पास फेमस लैब आैर रिकॉर्डिंग स्टूडियो था जहां 1946 से 1964 तक बनी अधिकांश फिल्मों के गीत रिकॉर्ड होते थे आैर इसी लैब में आग लगने के कारण अनेक फिल्मों के निगेटिव जल गए आैर भारतीय सिनेमा का इतिहास ही आंशिक रूप से आग की भेंट चढ़ गया। अब यह ऊपर वाले की पटकथा का कमाल है कि उसी स्थान पर बनी नई इमारत में शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर भारतीय सिनेमा की विरासत को बचाए रखने का एकल व्यक्ति प्रयास कर रहे हैं। फिल्म उद्योग के अनेक संगठन हैं परंतु वहां आपसी गुटबाजी के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। कोई संस्था या सरकार मदद नहीं कर रही है आैर नए भारत तथा ‘मेक इन इंडिया’ की बातें करने वाली केंद्रीय सरकार सिनेमा विरासत को बचाने का कोई प्रयास नहीं करती। मनोरंजन कर के रूप में इतिहास की एक पूरी सदी में अरबों रुपए एकत्रित करने वाली प्रांतीय सरकारें भी उदासीन हैं तथा करोड़ों का मेहनताने पाने वाले सितारे भी खामोश हैं।

हमारी दो हजार मूक फिल्मों में केवल सात फिल्में ही बच पाई है आैर पहली सवाक फिल्म ‘आलम-आरा’ का भी कोई प्रिंट नहीं बचा। जाने कितने क्लासिक काल कवलित हो गए हैं आैर जाने कितने रेस्टोरेशन के अभाव में नष्ट होने वाले हैं जिनमें ‘दो बीघा जमीन’, ‘आवारा’ इत्यादि शामिल हैं। सत्यजीत रॉय की फिल्मों के रेस्टोरेशन अर्थात पुनरुद्धार का काम इस्माइल मर्चेंट ने किया आैर बाद में उन्हें संजोए रखने का काम अमेरिकन अकादमी कर रही है। चेतन आनंद की कॉन्स पुरस्कार पाने वाली 1946 की ‘नीचा नगर’ का एक प्रिंट सत्यजीत रॉय ने कलकत्ता के कबाड़ी दुकान से दस रुपए में खरीदा था। दरअसल भारतीय सिनेमा से जुड़ी कई वस्तुएं कबाड़खानों में बिकती हैं आैर ऐसी विरल जगहों से शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर ने माल खरीदा है, वे लंदन से केदार शर्मा की चीजें लाए, कारदार के लिए जगह-जगह भटके। जैसे ही उन्हें कोई खबर मिलती है, वे वहां पहुंच जाते हैं। श्री 420 में कबाड़ी कहता है कि उसके पास ईमान गिरवी रखने वाले भी आते हैं। उन्होंने राजकपूर का मिचे