दिल को नया बनाती है स्टेम सेल थैरेपी
हिंदुस्तान में स्वास्थ्य रक्षा की सुविधाओं और डॉक्टरों की गुणवत्ता सर्वोत्तम है। हम चिकित्सा के क्षेत्र में दुनिया की अत्याधुनिक और बहुत जटिल किस्म की सर्जरी कर लेते हैं। फिर दूसरे देशों, खासतौर पर विकसित देशों की तुलना में लागत 10 गुना कम है। अब इसमें हमारे सामने चुनौती यह है कि यह अत्याधुनिक सुविधा हर हिंदुस्तानी को कैसे उपलब्ध कराई जाए। इसे चुनौती के रूप में लेना चाहिए। हमने यानी मेडिकल कम्युनिटी ने आपस में बहुत चर्चा करके सरकार को इसका ब्ल्यू प्रिंट दिया है। ब्ल्यू प्रिंट फॉर यूनिवर्सियल हैल्थ। यानी कैसे हर हिंदुस्तानी को मूलभूत चिकित्सा सुविधाएं मिले। जो उसका हक है। हमारी कमेटी ने जो सुझाव दिया है, वह यह है कि अभी जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना है उसमें गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को 30 हजार रुपए का कवर दिया जाता है। यानी इसके तहत 30 हजार तक के इलाज का खर्च उठाया जा सकता है। हमने सुझाव दिया है कि इस राशि को बढ़ाकर 60 हजार कर दिया जाए। इससे सेकंडरी हैल्थ केयर की सारी सुविधाएं जुटाई जा सकेगी। यानी बीमारियों का इलाज, छोटे ऑपरेशन। यह सब निजी अस्पताल में भी हो सकेंगे। यह सुविधा गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों को मिल जाएगी।
इसके अलावा यदि हम हर परिवार को 2 लाख रुपए प्रतिवर्ष का अतिरिक्त फ्लोट दें। अब ऐसा तो नहीं होता कि सब एक साथ बीमार पड़ जाएं, इसलिए इसका बोझ इतना ज्यादा नहीं होगा। यदि सात प्रमुख सर्जरी के लिए दो लाख का कवर होगा तो बहुत फायदा होगा। जैसे हार्ट सर्जरी हो गई, ब्रेन सर्जरी हो गई या लंग सर्जरी हो। हम चाहते हैं कि निजी अस्पताल यह प्रतिबद्धता जता दें कि चाहे आज की तारीख में इन सर्जरी में 3 लाख का खर्च आता हो पर हम ये सात सर्जरी 2 लाख में कर देंगे। इससे आम लोगों को बहुत राहत मिल जाएगी। यह तो हम तत्काल कर सकते हैं। यह भी संभावना है कि इस बार के केंद्रीय बजट में इस पर कोई चर्चा हो और कोई घोषणा कर दी जाए। हमने प्रधानमंत्री मोदीजी से भी चर्चा की कि हम इस तरह की व्यवस्था चाहते हैं और सरकार भी चाहती है िक लोगों तक स्वास्थ्य रक्षा की सुविधाएं पहुंचे। दोनों ओर से सोच एक जैसी हो तो मेरी उम्मीद बढ़ गई है कि कुछ होगा।
दूसरी अच्छी बात यह है कि इलाज का चलन उल्टा हो गया है। जब मैं अमेरिका में था तो लोग भारत से वहां इलाज कराने आया करते थे। अब अमेरिका से लोग यहां इलाज कराने आते हैं। यह मेरा अनुभव है। साफ है कि भारतीय मेडिकल क्षेत्र रूपांतरण हो गया है। इसीलिए मेडिकल टूरिज़्म भी बढ़ रहा है, क्योंकि बाकी दुनिया को यह अहसास हो गया है कि भारत में यह क्षमता है, स्किल का वह लेवल है।
अब मेरे क्षेत्र की, कार्डियोवैस्कूलर यानी दिल-धमनियों संबंधी रोगों की चर्चा करें तो कई सकारात्मक बातें हुई हैं। हम बचाव से शुरू करते हैं। सबसे पहले दिल पर से लोड कम करना होगा, क्योंकि यह नहीं किया तो हिंदुस्तान में इतना पैसा तो नहीं है कि हर व्यक्ति को सर्जरी मुहैया कराई जा सके। इस दिशा में हमने बार-बार प्रचार किया है कि कैसे हम चुस्त-दुरुस्त रहें। तीन बिल्कुल आसान-से गुर हैं। पहला, खान-पान पर लगाम रखें। तली हुई और मीठी चीजें बहुत कम और सब्जियां फल ज्यादा लें। दूसरा, एक्ज़रसाइज। रोज 45 मिनट इसे दीजिए। चाहे आप 30 मिनट दौड़-भाग करें और 15-20 मिनट योगासन करें। हफ्ते में चार दिन भी यह किया तो आप फिट रहेंगे। वजन काबू में रखना है, जो आदर्श वजन है उससे 10 फीसदी ऊपर-नीचे के दायरे में बने रहना है। ये बातें सामान्य रूप से मालूम है पर मैं इसलिए दोहरा रहा हूं कि बार-बार कहने से ही यह हमारी जीवनशैली का हिस्सा बनेगा। अब प्रचार का ही नतीजा है कि जागरूकता बढ़ गई है। कोई अपराध की खबर है तो हो सकता है कि उसे नजरअंदाज कर दिया जाए, लेकिन अगर दिल के रोग से बचने की कोई बात हो तो व्यक्ति अपने-आप एक बार तो जरूर पढ़ लेता है। कई वर्षों से हम प्रचार में लगे हैं और लोगों में काफी हद तक जागृति गई है।
अब इसके आगे यह है कि जिसको दिल का रोग हो जाए तो उसका जल्द और कम लागत में इलाज हो जाए। हार्ट अटैक के पहले उसका इलाज करना है। कई तरह के स्टेंट आए हैं। स्टेंट के बंद होेने का खतरा कम हुआ है। 20 फीसदी बंद हो जाते थे, अब सिर्फ 10 फीसदी में यह जोखिम है। बायपास में पहले हम हार्ट-लंग मशीन पर दिल को रोककर ऑपरेशन करते थे, अब धड़कते दिल पर बायपास करते हैं। तकलीफ आधी रह गई और लागत भी कम हो गई है। फिर छोटे-छोटे छेद के जरिये बायपास करने लगे ताकि छाती खोलनी पड़े। अब रोबोटिक सर्जरी में पांच मिलीमीटर के छेद से बायपास सर्जरी हो जाती है।
सबसे बड़ी बात यह हुई है कि जिन लोगों का हार्ट कमजोर हो जाता था तो हम उनके लिए कुछ नहीं कर पाते थे। अब स्टेम सेल के जरिये उनका इलाज शुरू कर दिया है। उसके बहुत अच्छे नतीजे आए हैं। यह लोगों के लिए नई उम्मीद है। इसके इलाज से 80 फीसदी रोगियों को बहुत फायदा हुआ है। इसमें रोगी के बोन मेरो से स्टेम सेल अलग करके उन्हें दिल में इंजेक्ट किया जाता है। स्टेम सेल नई कोशिकाएं बनाकर दिल को नया बना देती हैं। यह कैथेड्रल की मदद से ही हो जाता है। ट्रांसप्लाट और आर्टिफिशियल डिवाइस का इस्तेमाल भी आम हो गया है। इन सारी तकनीकों से हृदय रोगियों के लिए नई उम्मीद जागी है।
हमारे व्यवसाय में कई अनुभव गहरे संतोष से भर देते हैं। जैसे मुझे एक लेडी का फोन आया। कहने लगी, ‘डॉक्टरों ने कहा है िक मेरे पति की मौत हो गई है पर मुझे विश्वास नहीं है कि वे चले गए हैं। मैं नहीं मानूंगी जब तक आप नहीं देख लेते।’ मैं भागकर हॉस्पिटल पहुंचा। मैंने देखा उसका ब्लड प्रेशर 40-50 हो गया था। इसमें हम समझते हैं कि आदमी बच नहीं सकता। मैंने एक डिवाइस की मदद से आहिस्ते-आहिस्ते ब्लड प्रेशर बढ़ाया और फिर उसे ऑपरेशन थिएटर में ले गया। कठिन परिस्थितियों में उसका ऑपरेशन किया और वह बच गया। मुझे जीवन का सबसे बड़ा सबक मिला कि कभी भी आप हाथ खड़े मत करो। जब तक भगवान डिसाइड करें, हमें हाथ खड़े नहीं करने चाहिए। एक बार एक बौने कद का 40-45 साल का रोगी लाया गया। उसका कद साढ़े तीन-चार फीट का था। उसे हार्ट अटैक चुका था। चार अस्पतालों ने सर्जरी से इनकार कर दिया। कहा कि वह इतना छोटा है कि ऑपरेशन नहीं हो सकता। मेरे पास लाए तो वह बेहोश हो गया। मैंने उसका ऑपरेशन कर दिया। छह दिन बाद वह चंगा होकर घर चला गया।
मेरा मानना है कि रोगी के साथ डॉक्टर का भावनात्मक रिश्ता होना चाहिए। डॉक्टर यदि रोगी को अपने माता-पिता या भाई-बहन की तरह देखेगा तो उसी भावना से सेवा कर सकेगा। अच्छा डॉक्टर बनना है तो यह करना पड़ेगा। भावनात्मक लगाव होगा तो आप पूरी ताकत से उसे बचाने की कोशिश करोगे। हमें अमेरिका में सिखाते थे कि भावुकता से बचना चाहिए वरना तकलीफ होगी। मैं पूछता हूं कि इसमें गलत क्या है। नाकामी पर कोई तकलीफ हो रही है तो यह तो अच्छी बात है। अगली बार वह ज्यादा ऐहतियात बरतेगा। भावनात्मक लगाव रखंे और कभी हार मानें, ये दो गुण डॉक्टर में होने चाहिए। info@medanta.org
(जैसाउन्होंने आनंद देशमुख को बताया।)
डॉ. नरेश त्रेहान
एमडी चैयरमैन मेदांता-द मेडिसिटी