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हरिशचंद्र पर नाटक की प्रस्तुति

7 वर्ष पहले
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इंदिराकला संगीत विश्वविद्यालय के नाट्य विभाग द्वारा शनिवार को आडिटोरियम में राजा हरिशचंद्र स्मरण मुक्ति बोध नाटक का मंचन किया गया।आज के मौजूदा दौर मे जब साहित्य समाज से दूर और केवल बौद्घिक विमर्श का विषय रह गया है, जिसे संजोए रखने का काम रंगकर्मी कर रहे हैं, जो केवल नौटंकी नहीं बल्कि कला का अनूठा संगम है, जहां कलाकार अपने अभिनय से इतिहास के पन्नों से रूबरू कराते हैं।

प्रस्तुत नाटक मे हरिशचंद्र के जीवन को सारगर्भित रूप से बताया गया कि किस तरह विश्वामित्र के श्राप का असर उनके जीवन पर पड़ता है। प|ी के साथ विद्रोह होता है और प|ी के साथ बेटे की बोली लगाई जाती है। इसके बाद असहाय राजा खुद बिक जाते हैं और श्मशान में लाश जलाने काम करते हैं। यहां तक अपने बेटे की मुखाग्नि तक का पैसा लेते हैं, पूरे नाटक के दौरान सबसे मार्मिक प्रसंग मरघट वाला देखा गया। वहीं कुछ अंतराल बाद हिन्दी के प्रगतिशील कहानीकार समीक्षक गजानंद माधव मुक्ति बोध के द्वारा रचित रचनाओं पर नाट्य विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ.योगेन्द्र चौबे निर्देशित नाटक स्मरण मुक्तिबोध का मंचन किया गया,नाटक मे बडे़ सहज ढंग उनके जीवन को विस्तार से बताया कि किस तरह उनकी दिन चर्चा थी और वे कैसे थे, मुक्ति बोध का विवाह माता पिता के इच्छाओं के विरुद्ध हुआ था, उनका जीवन संघर्ष और विपन्नता में कटा,सन् 1962 मे उनकी अंतिम रचना भारत इतिहास और संस्कृति प्रकाशित हुई और उनके इस लेख से तत्कालीन सरकार चौकन्नी हो गई। उपस्थित छात्र-छात्राओं ने जमकर प्रशंसा की। प्रस्तुत नाटक में शुभम शर्मा, घनश्याम साहू, काजोल मुस्कान, भुनेश्वर महिला ने, गौरव चौहान, अंकित चौबे ने भूमिका निभाई।

नाटक की प्रस्तुति देते कलाकार।