कंजूसी, किफायत एवं फिजूल खर्ची का आइना
जापान ईस्ट एशिया नेटवर्क कार्यक्रम के लिए अनुष्का का हुआ चयन
‘जिंदगी’ पर प्रसारित ‘आइना दुल्हन का’ कंजूसी, किफायत आैर फिजूल खर्ची के अंतर को रेखांकित करते हुए मध्यम वर्ग के जीवन के आइने के रूप में हमारे सामने प्रस्तुति। अब यह सीरियल अपने अंत की आेर अग्रसर है। दरअसल हमारे लिए इसका महत्व यह है कि हम सदियों की आजमाइश से उभरे व्यवहारिक जीवन के लिए निर्वाह का यह एक मंत्र बन चुका है। आज चहुंओर फिजूल खर्ची को बढ़ावा दिया जा रहा है आैर इसे आधुनिकता कहने की गलती भी की जा रही है। भारत के अर्थशास्त्र का आधार हमेशा बचत रहा है जो भविष्य की सुरक्षा भी है आैर राष्ट्र की संपदा के प्रति सम्मान भी है। एक जमाने में लाख रुपया अनेक लोगों के जीवन का लक्ष्य होता था आैर आज करोड़ों की बातें इस तरह की जाती है मानो वह मात्र सौ रुपया है। इस विचार को तमाम अखबारों में फिल्म सितारे आैर फिल्मों की आय के बढ़ा चढ़ाकर दिए गए झूठे सच्चे फिगर द्वारा बढ़ाया जाता है। कहीं कोई नेट आय की बात नहीं कर रहा है वरन् ग्रॉस को अपनी आय बता रहा है। मसलन विदेश में दस डॉलर की टिकिट बिक्री में से छह डॉलर सिनेमा घर का किराया आैर लोकल प्रचार का खर्चा है तथा शेष चार डॉलर में वितरक का कमीशन काटकर बमुश्किल तीन डॉलर निर्माता की आय है।
आज सामान्य जीवन में कंजूसी को अपशब्द की तरह बना दिया है। घातक तो यह है कि किफायत अर्थात सोच समझकर वाजिब मूल्य में आवश्यक वस्तु खरीदना है परंतु इसे पुराना विचार कहकर आधुनिकता के बरखिलाफ खड़ा किया जाता है। हमने अपने बच्चों के प्यार के नाम पर उन्हें बेहिसाब रुपए जेब खर्च के लिए देना शुरू किया है आैर उनसे हिसाब मांगने को तो गुनाह का दर्जा दे दिया गया है। पहले परम्परा थी कि जेब खर्च का हिसाब मांगा जाता था जो एक स्वस्थ बात होने के साथ धन का मूल्य समझाने की कोशिश थी। एक तरह से पैसा बचाना, पैसा कमाने की तरह है जैसे क्रिकेट में चुस्त फील्डर रन बचाता है जो उसके रन बनाने के खाते में जोड़कर उस खिलाड़ी का मूल्यांकन होना चाहिए। एक जमाने में एकनाथ सोलकर शॉर्ट मिड ऑन पर खड़े रहकर जमीन पर गिरने के एक इंच पूर्व ही कैच कर लेते थे। जाने प्रसन्ना, चंद्रशेखर आैर वेंकटरमण को मिले विकेट में एकनाथ सोलकर का सहयोग कितना महत्वपूर्ण था। इसी तरह जीवन में रुपया बचाने का महत्व है। फिजूल खर्ची को तड़क-भड़क आैर दिखावे की