किसानों को अब भी पैराकोठी पर ही भरोसा
प्रमाणिकबीज अंकुरण में फेल हो जाने के बाद किसान एक बार स्वयं बीज तैयार करने की प्रक्रिया में जुट गए हैं। धान बीज की सौ फीसदी अंकुरण सुनिश्चित करने के लिए किसानों को अब भी परंपरागत पैराकोठी (लोटना) पर भरोसा है। किसान तैयार बीज को सुरक्षित रखने व्यापक पैमाने पर लोटना बनाने में जुटे हुए हैं। पैरा से तैयार होने वाली कोठी की लागत किसान सौ रुपए (एक दिन की मजदूरी) बताते हैं। दावा है कि इसमें संरक्षित अनाज दो-तीन साल तक खराब नहीं होता और उसमें अंकुरण की क्षमता बनी रहती है।
खैरट के दिनेश चंद्राकर ने बताया कि पिछले तीन साल से शासन द्वारा दिया जा रहा बीज अंकुरित नहीं हो रहा था और उन्हें दो बार बोनी की जरुरत पड़ जाती है, इसलिए अब वे खुद ही बीज तैयार करने में जुट गए हैं। खुद से तैयार बीज पर उन्हें सौ फीसदी अंकुरण की गारंटी मिलती है।
कई विशेषताओं से भरी होती है पैराकोठी
ऐसे तैयार होती है पैराकोठी
टुहलू गांव के संतराम मांझी का कहना है कि पैराकोठी में नमी की मात्रा बिल्कुल भी नहीं सकती। पैरा की प्रकृति गर्म होने के कारण यहां संरक्षित अनाज मंे सुरही की शिकायत नहीं होती। सुरही नहीं होने के कारण धान का हरेक दाना बदरामुक्त और साबूत होता है। पैरा की गर्मी के कारण बीज में अंकुरण की क्षमता बनी रहती है। पैरा की रस्सी को चूहे काट नहीं सकते, इसलिए पैराकोठी में संरक्षित धान का बीज जस का तस रहता है। किसान अक्सर बीज संरक्षण के साथ-साथ पैराकोठी का इस्तेमाल घरेलू उपयोग के लिए लाए जाने वाले धान को सुरक्षित रखने के लिए भी करते हैं।
कुलिया गांव के हेमचंद और नेहरू यादव ने बताया कि पैराकोठी को तैयार करने के लिए एक मजदूर को दिनभर का समय लगता है। पहले पैरा को छांटकर मोटी रस्सी बनाई जाती है और रस्सी को गोल लपेट कर उसमें संरक्षित किए जाने वाले अनाज को भरा जाता है। पैरा और उससे बनने वाली रस्सी में मजबूती के कारण धान का एक-एक दाना सुरक्षित हो जाता है। पूरी तरह पैराकोठी तैयार हो जाने के बाद अष्टकोणीय हिस्सों से और मजबूत ढंग से उसे बांधा जाता है। पैराकोठी को एक स्थान पर ही रखने की विवशता होती है क्योंकि उसे भारी होने के कारण हटाया नहीं जा सकता, इसलिए उसे जहां साल-दो साल रखना है उसी जगह पर ही बनाया जाता है।
पलसीपानी के लोभो सिंह ने बताया कि प्रमाणिक बीज अंकुरण में फेल होने के पीछे सबसे बड़ा कारण भं