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पीएचई से छीनकर पंचायत को सौंपा स्वच्छ गांव बनाने का जिम्मा

6 वर्ष पहले
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लक्ष्यअनुरूप निर्मल ग्राम बनाने में नाकाम रहे पीएचई (लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग) से योजना का जिम्मा छीन लिया गया है। अब यह जिम्मेदारी जिला पंचायत को सौंपी गई है।

24 फरवरी 2014 के अंक में भास्कर ने यह खुलासा कर बताया था कि दस साल में 45 करोड़ फूंकने के बाद भी जिले का 45 गांव भी निर्मल नहीं हो सका। केंद्र की सरकार ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया और जांच की। परिणाम आया कि पूरे छत्तीसगढ़ में यह विभाग गांवों को स्वच्छ करने के लक्ष्य पर पहले ही पायदान में फिसड्‌डी साबित हो गया है। विभाग बदलने के साथ-साथ योजना का नाम भी बदल दिया गया है। स्वच्छ भारत अभियान से जोड़कर इस काम को पूरा कराने की जिम्मेदारी जिला और जनपद पंचायतों को सौंपी जा रही है।

29 दिसंबर को महासमुंद और राज्य के दूसरे जिलों में यह जिम्मा पंचायतों के अधीन करने का आदेश जारी किया गया है।

जिले के गांवों में निर्मल भारत योजना से बने शौचालयों का इस तरह उपयोग।

24 फरवरी को प्रकाशित

निर्मल ग्राम योजना, जिसमंे गांवों को शुद्ध और स्वच्छ बनाने के लिए केंद्र और राज्य की सरकार से शौचालय निर्माण हेतु महासमुंद जिले में 45 करोड़ खर्च किए गए। विडंबना यह रही कि योजना से 45 गांवों को पूरी तरह लाभान्वित नहीं किया जा सका। जिन गांवों को राष्ट्रपति से निर्मल ग्राम का पुरस्कार दिलवाया गया उन गांवों में भी 95 फीसदी शौचालय कूड़ेदान के रूप मंे इस्तेमाल होने लगे। दिल्ली से आए निर्मल भारत की टीम ने अपने कई दौर के भ्रमण से यह पुष्टि कर दी कि योजना का इस्तेमाल सिर्फ दिखावे के लिए किया जा रहा है।

भास्कर ने किया था खुलासा

दस साल में 45 करोड़ फूंकने के बाद भी महासमुंद के 45 गांव नहीं हुए निर्मल

बेहतर परिणाम देने प्रयास

िजलापंचायत के सीईओ एसएन राठौर का कहना है कि पीएचई से योजना को छीन कर जिला पंचायत के सुपुर्द किया गया है। निर्मल भारत और ग्राम योजना का कान्सेप्ट स्वच्छ भारत अभियान के रूप में गांवों तक पहंुचाने की जो जिम्मेदारी मिली है उसके तहत बेहतर परिणाम देने का प्रयास हो रहा है। प्लान पंचायत और जनपदों के माध्यम से मंगाकर गांवों को स्वच्छ बनाने की दिशा में ठोस कार्यक्रम जारी किए जाएंगे। अभी तैयारियां शुरू की गई है।