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मलेरिया से मौत के आंकड़े छिपा कागजों में उन्मूलन का खेल

7 वर्ष पहले
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इसके बावजूद कम नहीं हो रहे मलेरिया के गंभीर मरीज।

भास्करन्यूज|राजनांदगांव

जिलेमें मलेरिया उन्मूलन का काम सिर्फ कागजों में चल रहा है। वनांचल में हालात बदतर हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में गंभीरता से काम नहीं हो पा रहा है। इसी वजह से मलेरिया के गंभीर पीडि़तों के आंकड़ों में कमी नहीं रही है। विभागीय अफसर फील्ड वर्कर नहीं होने का बहाना कर रहे हैं, जबकि उन्मूलन के लिए हर साल 25 से 30 लाख रुपए खर्च किए जा रहे हैं। दूसरी ओर मलेरिया से मौत के आंकड़ों को भी छिपाया जा रहा है। हाल ही में मलेरिया से बरगांव नवागांव निवासी किरण यादव की मौत के कारणों के लिए गोलमोल जवाब दिया जा रहा है, जबकि मेडिकल सर्टिफिकेट में मौत का कारण स्पष्ट रूप से मलेरिया लिखा गया है। इसी तरह अब तक कई मामले दबाए जा चुके हैं।

अस्पतालों में मलेरिया से गंभीर पीड़ित रोज रहे हैं। रोजाना करीब दो दर्जन से ज्यादा स्लाइड की जांच की जा रही है। डीडीटी का छिड़काव करने के लिए हर साल 25 लाख रुपए खर्च किए जा रहे हैं। मैदानी स्तर पर काम नहीं हो पा रहा है। इसी वजह से मरीजों की संख्या इस बार बढ़ती जा रही है। जिला अस्पताल के अलावा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी यही हालात हैं। मलेरिया पीड़ितों की मौत को ब्रेन फीवर बताकर डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी से बचते नजर रहे हैं। हाल ही में हुई किरण की मौत के बाद जानकारी छुपाई गई।

स्लाइड ही नहीं बनाई गई

किरणको 12 सितंबर की शाम सात बजे जिला अस्पताल में दाखिल कराया गया था। सेंट्रल लेबोरेटरी में उसका स्लाइड नहीं बनाई गई। लैब के रजिस्टर में उसकी इंट्री ही नहीं हो पाई है। मतलब साफ है कि किट के माध्यम से ड्यूटी नर्स ने उसकी मलेरिया जांच की थी। इसी वजह से मेडिकल सर्टिफिकेट में मौत का कारण मलेरिया लिखा गया था।

जांच में भी लापरवाही

अस्पतालके वार्ड से सेंट्रल लैब में भेजी जाने वाली स्लाइड भी ठीक से नहीं बनाई जा रही है। बुधवार को यहां का जायजा लिया गया तो यह चीज खुलकर सामने आई। जांच के लिए निकाले गए रक्त को स्लाइड पर ठीक से रखा नहीं जाता। वार्ड से लैब तक आते तक पूरा रक्त फैल जाता है।

सीधी बात

दस साल में इतने मरीज

(जुलाई 2014 तक)

वर्षसामान्य गंभीर योग

2004 2542 1068 3610

2005 3362 368 3730

2006 2768 656 3424

2007 2464 532 2991

2008 2276 817 3093

2009 1532 383 1