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कथा पहले दुर्लभ थी, अब सुलभ हो गई है:नरेश भाई

7 वर्ष पहले
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वृंदावनधाम स्टेट स्कूल मैदान में आयोजित श्रीमद भागवत ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन भागवताचार्य नरेशभाई राज्यगुरु ने नृसिंह भगवान जन्म वृतांत बताते हुए कहा कि श्रीमद् भागवत कथा पहले बड़ी दुर्लभ हुआ करती थी। कथा कभी बड़े शहर, बड़े गांव में साल-दो साल में हुआ करती थी। किंतु आज यह भागवत कथा हर शहर, गांवों में होने लगी है, इसकी महत्ता बढ़ी है। मानव भागवत कथा पांच भय से सुनते हैं।

मनुष्य भय के कारण से कथा सुनने के लिए बाध्य हो जाते हैं। इसे भय से मानव जीवन में भागवत कथा श्रवण का महत्व है। ये पांच भय हैं पहला-भगवान, दूसरा-समाज, तीसरा-राज्य, चौथा-धर्म और पांचवां-पतन। इन पांचों भय से डर कर ही मनुष्य भागवत भक्ति में लीन होता है। भागवत हमें निर्भय बनाती है, मृत्यु के भय से मुक्त कराती है। इसके श्रवण से मनुष्य को अपार शांति की अनुभूति होती है। मानव भगवान के शरण में जिस प्रकार शांति प्राप्त करता है उसी प्रकार भागवत कथा सुनने, पढ़ने से उसके सारे दुखों का नाश होता है मनुष्य योनी से मुक्ति मिलती है। कान्हा महिला मंडल द्वारा आयोजित भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह के तीसरे दिन भागवताचार्य ने हम सबके भीतर भगवान के कण है। मनुष्य के हृदय में भगवान विराजमान रहते हैं। लेकिन मनुष्य के भीतर प्रेम तत्व रहेगा तभी व्यापक प्रभु को पाया जा सकता है। क्योंकि प्रेम से ही प्रभु को पाया जा सकता है।

भगवान को नहीं मानने वाले नास्तिक लोगों द्वारा ही भगवान के नहीं होने की बात कही जाती है, बल्कि सत्य यह है कि भगवान के बिना मनुष्य का जीवन संभव ही नहीं है। यही भगवान के होने का प्रमाण है। मनुष्य जीव सामान्य नहीं है। हम भगवान के अंश है। इसलिए हमें अपने आप पर गर्व होना चाहिए। चार श्लोक में भगवान नारायण ने ब्रह्माजी को संसार की व्यापकता बताई। ब्रह्माजी ने श्रृष्टि के निर्माण के लिए सबसे पहले 10 मानस पुत्रों को जन्म दिया। अनेक साल तप करने के बाद ब्रह्माजी के शरीर के दो हिस्से हो गए। एक हिस्सा मनु महाराज और दूसरा हिस्सा सतरूपा रानी के रूप में निर्माण हुआ।

भगवान और मां के प्रति रहो समर्पित

इस दौरान उन्होंने बताया कि संसार में भगवान और जन्म देने वाली मां के प्रति समर्पित होना चाहिए। नृसिंह जन्म कथा बताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान नारायण के संकल्प से श्रृष्टि की उत्पत्ति हुई है। भगवान की अनेक होने की कामना से श्रृष्टि