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पितरों का श्राद्ध कर उतार रहे ऋण ले रहे आशीष
पितरोंके पूजन का पर्व पितर पक्ष 9 सितंबर से आरंभ हो गया है, जो 24 सितंबर तक चलेगा। इस दौरान लोग अपने पुरखों को तर्पण कर आशीष ले रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितर पक्ष में पितरों (पूर्वजों) के लिए किए गए कार्यों से उनकी आत्मा को शांति मिलती है।
कहते हैं जो श्राद्ध करता है उसे पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। ज्योतिषि के जानकार पं. शैल कुमार पाण्डेय का कहना है कि पितर पक्ष के सोलह दिनों में पांच शुभ संयोग सर्वार्थ सिद्धि, अमृत सिद्धि और रवि-सोम पुष्य नक्षत्र के रहेंगे। 11 सितंबर को सर्वार्थ सिद्धि योग सूर्योदय से शुरू होकर अगले दिन दोपहर 12.20 तक रहेगा। यही योग 15 और 18 सितंबर को भी बनेगा। 19 सितंबर को पुष्य नक्षत्र रहेगा। पं. शैल कुमार के अनुसार यदि पूर्वजों के देहावसान की तिथि मालूम नहीं हो तो कुछ तिथियां तय की गई हैं, जिनमें उनके नाम का श्राद्ध किया जा सकता है। आगामी 17 सितंबर को नवमी श्राद्ध है। इसे मातृ नवमी भी कहते हैं। इस तिथि को माता के श्राद्ध के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन श्राद्ध करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है। इसी तरह से 19 20 सितंबर को एकादशी द्वादशी तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है जिन्होंने संन्यास लिया हो। इसके अलावा 22 सितंबर को चतुर्दशी पर उन परिजनों के श्राद्ध किए जाते हैं, जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो। वही सर्व पितृ अमावस्या पर 24 सितंबर को ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। पंडित शैल पाण्डेय के अनुसार समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुखी नहीं रहता है।
पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश और कीर्ति प्राप्त करता है। देवकार्य में पितृ को बहुत अधिक महत्व दिया गया है।
नहीं मिल रहे कौअे
पौराणिकमान्यता है कि श्राद्ध पक्ष में कौवे दिवंगत परिजनों के हिस्से का खाना खाते हैं, तो पितरों को शांति मिलती है और उनकी तृप्ति होती है। लेकिन पितृ दूत कहलाने वाले कौवे अब क्षेत्र में कम ही नजर आते हैं। लगातार बढ़ते शहरीकरण, पेड़ों की कटाई और ऊंची इमारतों के कारण अब कौवों के रहने लायक वातावरण नहीं मिल पा रहा है यही कारण है कि इनकी तादात लगातार घटते जा रही है। एक समय था जब घर आंगन में ये बड़ी तादात में फुदकते रहते थे लेकिन अब ये दिखना भी बंद हो गए है। क्योंकि प्रकृति का जो ह्वास हुआ है, उसने