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गांवों की गलियों ने गंदी नालियों का रूप लिया
राज्यसरकार द्वारा गांवों की साफ सफाई की दृष्टिकोण से कीचड़ और गंदगी से मुक्ति दिलाने के लिए गलियों में सीसी रोड का निर्माण कराया गया है। वहीं पेयजल के घटते स्रोतों के मद्देनजर स्पाट सोर्स एवं ओवरहेड नल जल की सुविधा प्रदान की गई है। इसे योजनाओं की खामी कहें या प्रशासन की लापरवाही या ग्रामीणों में जागरूकता की कमी कि अंचल के भटभेरा, कुथरौद, हिरमी, बुड़गहन, मटिया, फरहदा जैसे अनेक गांवों की गलियों ने बारह महीने गंदे नालियों का रुप ले लिया है।
गांवों की गलियों में कच्ची दीवारों मिट्टी, धुल, मवेशियों के गोबर घरों से निकलने वाली जूठन युक्त गंदा पानी बारहो माह गली मे कीचड़ के रुप में भरे रहते है। कीचड़ से बजबजाती गलियों में वाहनों में सवार होकर भी गुजरने से उबकाई आती है। इससे पैदल चलने वालों की हालत क्या होगी यह समझा जा सकता है। दरअसल शासन द्वारा 2 से 5 लाख ऐस्टीमेट में गलियों का कांक्रीटीकरण तो कर दिया जाता है। वहीं नल जल के पर्याप्त कनेक्शन भी बांट दिया जाता है परंतु पानी निकालने नालियों का कोई ऐस्टीमेट में नहीं किया है।
और तो और जिन गांवों में25 लाख रुपए से बनाए गए गौरव पथ मे भी नालियों का निर्माण नहीं हुआ है। जबकि गौरव के दोनों ओर नालियां बनाने का प्रावधान है। इसके बाद भी ठेकेदार बिना नाली बनाए कैसे चला जाता है। यह तो विभागीय अधिकारी ही अच्छी तरह से जानते हैं, पर इसके कारण ग्रामीणों के जनजीवन वातावरण में इसका दुष्प्रभाव पड़ने लगा है। इसका कारण है कि गीलेपन और गंदगी के कारण केवल बरसात ही नहीं अपितु बारहों माह गलियों में पैदल चलना दुभर हो गया है।
वहीं गलियों में गंदे पानी भरे होने से उसमें उत्पन्न होने वाले मक्खी और मच्छरों से गंभीर बीमारी फैलने की आशंका हमेशा बनी रहती है। बीते बरसात में करेली, मोहरा, रावन आदि गांवों में फैले डायरिया इसका प्रमाण है। क्योंकि यही गंदा पानी आखिर में पेयजल निस्तारी के स्त्रोत में मिल जाते है। हिरमी की उमा, कौशिल्या आदि महिलाओं ने बताया कि गलियों की गंदगी और कीचड़ के कारण हमारा जीवन नारकीय बन गया है। पहले कम पानी निकलता था और उसे भी मिट्टी सोख लेती थी। अब घर से निकलते ही सामना गंदे,सड़े पानी, मिट्टी दुर्गंध से होता है। राजेंद्र, रामकुमार, सालिक साहू आदि ने कहा कि नालियां जब तक नहीं बनेगी गलियों के कीचड़ से निजात नहीं मिल सकता है।