पीएसओ साथ होते तो पटेल बच सकते थे
झीरम घाटी में कांग्रेस के काफिले पर हुए नक्सली हमले की जांच कर रहे एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग के सामने दिवंगत कांग्रेसी नेता नंद कुमार पटेल के तत्कालीन पीएसओ डामन देशमुख और अलकेश शुक्ला की गवाही दर्ज की गई।
एपीसी डामन देशमुख ने आयोग को बताया कि पटेल करीब 3.50 बजे वहां से निकले, लेकिन इससे पहले उन्होंने विधायक कवासी लखमा को अपने वाहन में बिठा लिया था। देशमुख ने आयोग को बताया कि उन्होंने सुरक्षा के लिहाज से उन्हीं के वाहन में बैठने की बात कही, जिस पर पटेल ने उन्हें पीछे के वाहन में आने को कहा। सुकमा से निकलने के बाद कुकानार में लोग स्वागत के लिए खड़े थे। यहां करीब 10 मिनट का विलंब हो गया। इसके बाद तोंगपाल में भी लोग स्वागत के लिए खड़े थे। वाहन रोकने के दौरान कार्यकर्ताओं में आगे निकलने की होड़ लग गई और उन्होंने काफिले के बीच में वाहन घुसा दिए थे। झीरम घाटी पहुंचते ही फायरिंग शुरु हो गइ। उनके वाहन के टायर में गोली लगने के कारण वे आगे नहीं बढ़ सके। इसके बाद वाहन से उतर कर उस ओर अपने साथियों के साथ फायरिंग करने लगे जिस ओर से गोली रही थी। गोलियां खत्म होने के बाद पिस्टल को छिपाया। नक्सली करीब आधे घंटे के बाद उसे बंधक बनाकर ले गए उन्होंने पर्स, पैसा, मोबाईल आदि भी ले लिया। पूछताछ के दौरान डामन ने स्वयं को विधानसभा का कर्मचारी बताया, महेंद्र कर्मा के बारे में पूछने पर उसने कहा कि सभा में वे दिखे थे इसके बाद उन्हें नहीं देखा। नंद कुमार पटेल के बारे में भी पूछा गया जिस पर उसने अनभिज्ञता जाहिर की। इस बीच सभी से आत्मसमर्पण करने आवाज लगाई। जिस पर कई लोगों ने सरेंडर किया इसमें कर्मा भी शामिल थे।
उन्होंने कर्मा को अंदर ले जाकर उनकी हत्या कर दी। अन्य लोगों को टीले पर जाकर लेटने काे बोला गया। नक्सलियों के चले जाने के बाद फोर्स पहंुची तब वहां से सभी उठे और घायलों को ढूंढकर एंबुलेंस से ले जाया गया। डामन ने आयोग को बताया कि यदि पटेल ने उन्हंे अपने साथ बैठने दिया होता तो वे कवरिंग फायर कर गाड़ी निकालने के लए ड्राइवर को साहस दिया होता या फिर दूसरे तरफ से उन्हें निकालने का प्रयास किया हाेता। उसने विश्वास जताया कि यदि वह उनके साथ बैठा होता तो उन्हें बचाल लेता। उसने बताया कि गाड़ियों के ककम्रम में भी बदलाव हुआ था। सुरक्षा की दृष्टि से दो वाहनों के बीच कम से कम 75 से 100 गज का फासला होना जरुरी है। इसके बावजूद काफिले की गाड़ियां एक दूसरे से चिपक कर चलाई जा रही थी। जिस मार्ग से काफिला गुजरा वहां आरओपी लगी थी। दूसरे गवाह अलकेश शुक्ला ने बताया कि घाटी में फायरिंग शुरु होते ही वह वाहन से कूद गया था। उसकी पिस्टल भी गिर गई थी, जिसे खोजने के बाद अपने वीआईपी को खोजने पहाड़ की ओर चला गया, वहां पर भी वे नहीं मिले तो इधर-उधर खोजने के बाद फिर से पहाड़ी पर चला गया। बाद में सीटी बजाने और कुल्हाड़ी की आवाज आने लगी। बाद में जंगल के रास्ते दरभा थाना पहुंच गया। यदि पीएसओ को साथ रखा होता तो वीआईपी को बचाया जा सकता है। क्योंकि जहां ट्रक फंसी थी वहां साइड से एक वाहन के निकलने की जगह थी। या फिर वीआईपी को दूसरे तरफ नाले के रास्ते बचाकर ले जाया जा सकता था, जैसे वे बचकर दरभा थाना पहुंचे। आयोग के सामने एक और साक्षी मंगेश मंडावी का बयान दर्ज नहीं कराया जा सका। आयोग ने अगली सुनवाई के लिए अब इसी महीने की 27 एवं 28 तारीख निर्धारित की है।
सरकारी वकीलों ने गवाही टाली, अब शपथ-पत्र देंगे
दोगवाहों के बयान दर्ज होने के बाद सरकारी वकील ने छह और गवाहों की सूची पेश करते हुए इनके बयान दर्ज किए जाने का अनुरोध किया। जिसमें एसपी अजय यादव, तत्कालीन एसपी मयंक श्रीवास्तव, तत्कालीन एसडीओपी भारतेंदु द्विवेदी समेत सीआरपीएफ के पीएस गबरियाल, वीएस सावंत और पीरु मोहन शामिल हैं।