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नासिक में स्ट्राबेरी, मुजफ्फरपुर में लीची उगाने और एक्सपोर्ट करने वाले भी केमिकल से दूर, एक महीना सुरक्षित रख लेते हैं फलों को

5 वर्ष पहले
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असगर खान/ठाकुरराम यादव | रायपुर

राजधानी में फलों के कारोबारी भले ही दावा कर रहे हैं कि फलों को पकाने के लिए केमिकल का इस्तेमाल जरूरी है, लेकिन देश के बंपर फल उत्पादक इलाकों के किसान बिना केमिकल के लीची, स्ट्राबेरी, अंगूर और केले जैसे जल्दी खराब होने वाले फलों को भी 30 से 45 दिन तक सुरक्षित रख रहे हैं। वहां के किसानों ने कूलिंग सिस्टम और विशेष तरह की पैकेजिंग से फलों को एक्सपोर्ट करने तक ताजा रहने लायक बना रखा है। नासिक और मुजफ्फरपुर के किसान भी उच्च गुणवत्ता और ज्यादा लाइफ वाले फल लगा रहे हैं। पंजाब, राजस्थान, गुजरात सहित देश के ज्यादातर बड़े फल उत्पादक किसानों ने भी केमिकल के नुकसान को ध्यान में रखते हुए फल पकाने और प्रिजर्व करने के लिए नई तकनीकें अपना रखी हैं। यही नहीं, वे गुणवत्ता वाले फलों के उत्पादन पर भी जोर दे रहे हैं।

रायपुर दो हफ्ते पहले पड़े छापों में फलों को घातक केमिकल से पकाने के खुलासे के बाद कुछ कारोबारी तर्क दे रहे हैं कि इसके अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। यही वजह है कि कच्चे फल खरीदकर उसे केमिकल से पकाया जा रहा है। इसकी सच्चाई जानने के लिए भास्कर ने देश के उन इलाकों में किसानों से संपर्क किया, जो बड़े पैमाने पर फलों का न सिर्फ उत्पादन कर रहे हैं बल्कि एक्सपोर्ट में भी लगे हैं। अंगूर, केला और स्ट्राबेरी का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले महाराष्ट्र के नासिक के किसानों का दावा है कि उन्होंने फलों को सुरक्षित रखने से लेकर पकाने तक, केमिकल का इस्तेमाल किया ही नहीं है। बल्कि वे प्रिजर्व करने की आधुनिक और सुरक्षित तकनीक का इस्तेमाल कर फलों को 30 से 45 दिनों तक सुरक्षित रख पाते हैं।

पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु आदि राज्य देश के बड़े अंगूर उत्पादक राज्य हैं।

केले का उत्पादन तीन राज्यों में सबसे ज्यादा होता है- महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल। गुजरात, असम, आंध्र प्रदेश, ओडीशा, बिहार, मध्य प्रदेश, त्रिपुरा, मेघालय आदि अन्य मुख्य उत्पादक राज्य हैं।

उत्तर प्रदेश और बिहार में आम का सबसे ज्यादा उत्पादन होता है। आध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात और पश्चिम बंगाल अन्य आम उत्पादक राज्य हैं।

जलगांव में केले की गाद कोल्ड चैंबरों में रखी जाती है
महाराष्ट्र के किसान जयंत कटांक ने कहा कि महाराष्ट्र के जलगांव, बुरगड़ से केला दक्षिण और मध्यभारत के कई राज्यों में सप्लाई किया जा रहा है। इसे कभी भी केमिकल से पकाने की कोशिश नहीं की है और न करेंगे। केले की गाद को पेड़ से डंठल के साथ काट लिया जाता है, फिर इसकी टाइट पैकिंग की जाती है। नीचे पत्ते रखकर थर्माकोल भी रखते हैं, ताकि हिले भी नहीं। इसी से केला खराब नहीं होता। यही नहीं, केले को पकाने के लिए एडवांस तकनीक अपना रहे हैं। बड़े-बड़े कैरेट में केले के 10-12 बंच रखे जाते हैं। फिटकरी इत्यादि से धोने के बाद उसे कोल्ड रूम के चेंबर में रख देते हैं। वहां यह सुरक्षित रहता है।

किन राज्यों में क्या उत्पादन
पूरा फंडा कूलिंग पर आधारित
देशमुख के मुताबिक स्ट्राबेरी बहुत ही संवेदनशील फल है, लेकिन इसे सही तरीके से रखा जाए तो यह 48 घंटे तक सुरक्षित रह सकता है। इसके लिए केमिकल की जरूरत ही नहीं है। स्ट्राबेरी को रखने के लिए एक खास तरह का स्ट्रे आता है। एक स्ट्रे में ढाई-ढाई सौ ग्राम के कप होते हैं। इसमें स्ट्राबेरी रखे जाते हैं। यह स्ट्रे सिस्टम बर्फ-नमक या फिर एयर कंडीशन के इस्तेमाल से कूल रहता है। इतना ध्यान रखने से ही स्ट्राबेरी ताजा हालत में विदेशों तक पहुंचा दी जाती है।

स्ट्राबेरी का गढ़ नासिक सिर्फ कूलिंग से रखते हैं ताजा

नासिक, खासकर महाबलेश्वर और आसपास का इलाका देशभर में स्ट्राबेरी के उत्पादन के लिए मशहूर है। सीजन में नासिक में ....टन स्ट्राबेरी पैदा की जाती है। बेहद संवेदनशील और जल्दी खराब होने वाले स्ट्राबेरी जैसे फल को वहां के किसान बिना केमिकल का इस्तेमाल किए ताजा रखते हैं, यह जानने के लिए भास्कर ने नासिक के स्ट्राबेरी उगाने वाले किसान संतोष देशमुख से बात की। वे 7 एकड़ में सिर्फ स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। इसके अलावा 5 एकड़ में अनार और अंगूर लगाया है। देशमुख अपनी स्ट्राबेरी मुंबई और पुणे के अलावा गुजरात तक भेज रहे हैं, जहां इसे भेजने में दो दिन लग जाते हैं। इसके बावजूद, वे केमिकल का उपयोग बिलकुल नहीं कर रहे हैं।

नागपुर के संतरे की पैकिंग ऐसी कि एक हफ्ते रहता है सुरक्षित

नागपुर के बड़े संतरा कारोबारी उमेश कुमार ने कहा कि नागपुर से देश के दूसरे कई राज्यों में संतरा एक्सपोर्ट होता है। संतरे को किसी भी तरह से रासायनिक प्रक्रिया से नहीं गुजारा जाता। संतरे को पेड़ में पकने के बाद ही तोड़ा जाता है। केवल यह ध्यान रखते हैं कि पूरी तरह पकने से कुछ पहले इसे तोड़ लिया जाए। इसके बाद सारा खेल पैकिंग का है। संतरे को सुरक्षित रखने के लिए उसे लकड़ी के कार्टून में पैरे के बीच रखा जाता है। इससे वह खराब नहीं होता और पूरे सात दिनों तक सुरक्षित रहता है। इसीलिए देश के कई राज्यों यहां तक कि विदेशों तक संतरे का निर्यात होता है।

अंगूर एयरकंडीशंड कंटेनरों में 30 दिन तक बिलकुल ताजा

नासिक के बड़े किसान लगद साहेब के अनुसार उननका अंगूर बांग्लादेश, भूटान, यूएस, यूके आदि देशों में एक्सपोर्ट होता है। वे अंगूर को 30 दिन और केले को 45 दिनों तक सुरक्षित रख सकते हैं, इसलिए एक्सपोर्ट कर पाते हैं। पेड़ से तोड़ने के बाद फलों को बड़े कंटेनरों में रखा जाता है। यह पूरी तरह वातानुकूलित होता है। यह थोड़ी खर्चीली पद्धति है, लेकिन लगदा साहेब ने कहा कि ज्यादा मुनाफे के लिए कच्चे फलों को केमिकल से पकाने की अपेक्षा बहुत बेहतर है। वे एक दशक से बायोलाजिकल इंडिया के ब्रांड से केमिकल रहित उत्पादन के लिए अभियान चला रहे हैं। उन्होंने एक सर्वे भी किया था, जिसमें यह बात सामने आई कि केमिकल से पके फल खाकर शहरी लोगों से ज्यादा ग्रामीण बीमार हो रहे हैं, क्योंकि पहले फल वही खाते हैं।

शाही लीची का एक्सपोर्ट मुजफ्फरपुर से, 15 दिन तक ताजा

बिहार के मुजफ्फरपुर के किसान मुरलीधर शर्मा ने कहा कि यहां लीची का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। वे खुद एक्सपोर्ट क्वालिटी का लीची लगाते हैं। एक्सपोर्ट क्वालिटी के लिए फलों की क्वालिटी अच्छी होनी चाहिए। साथ ही वह ज्यादा दिन तक टिक सके। लीची 10 से 15 दिनों तक आसानी से रह सकती है। इसलिए उसे अलग से पकाने की जरूरत नहीं। पेड़ से तोड़ने के बाद उसे विशेष तरह के बाक्स में रखा जाता है। बाक्स को कूलिंग सिस्टम के भीतर रखा जाता है, जिससे फल को ठंडक मिलती रहे। इस तरह आसानी से उसे दूसरे राज्यों और विदेशों तक भेजा जाता है।

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