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प्रवचन

4 वर्ष पहले
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मोक्ष प्राप्ति के लिए सम्यक ज्ञान जरूरी
सदर बाजार स्थित श्री ऋषभदेव जैन श्वेताम्बर मंदिर में जारी चातुर्मासिक आराधना के अंतर्गत साध्वी र|निधिश्री ने उमास्वातिजी महाराज द्वारा रचित तत्वार्थ सूत्र के प्रथम श्लोक ‘सम्यक ज्ञान दर्शन चारित्राणि मोक्ष मार्गम्‘ पर केंद्रित प्रवचन करते कहा कि मोक्ष प्राप्ति के लिए सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन व सम्यक चारित्रय का होना नितांत आवश्यक है।

इन र| त्रय के माध्यम से ही हम मोक्ष मंजिल को पा सकते हैं। सबसे पहले लक्ष्य निर्धारण आवश्यक है कि आपको कहां जाना है, मोक्ष जाना है तो फिर मोक्ष जाने के माध्यमों व साधनों को आत्मस्थ करना होगा। क्योंकि मोक्ष की प्राप्ति सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन व सम्यक चारित्र्य के बिना संभव नहीं है। उसी प्रकार बिना सम्यक दर्शन के व्यक्ति चाहे जितना ज्ञानार्जन कर ले उसका वह ज्ञान अधूरा-अपूर्ण ही है। मोक्ष प्राप्ति के लक्ष्य से सम्यक के बिना वह ज्ञान अज्ञान दशा में ही है। सम्यक दर्शन की महत्ता शून्य के आगे लगने वाले एक के अंक की तरह है। जिस प्रकार बिना अंक के शून्य चाहे जितने लगाओ उनका कोई मूल्य नहीं, उसी प्रकार सम्यक दर्शन उस महत्वपूर्ण एक के अंक की भांति है। एक के अंक के बाद जितने शून्य लगाओगे तो उसका मोल उतना ही बढ़ता चला जाएगा, सम्यक ज्ञान का महत्व तो है लेकिन सम्यक दर्शन के बाद ही वह महत्वपूर्ण और मूल्यवान है। बिना सम्यक दर्शन के जीव साढ़े 9 पूर्वों तक अध्ययन करता रहे लेकिन फिर भी उसके उस ज्ञान का मोक्ष प्राप्ति के लक्ष्य से कोई महत्व नहीं। सम्यक दर्शन केवल पंचेन्द्रिय जीव को ही हो सकता है अन्य जीवों को नहीं।











जैसे ही सम्यक दर्शन की प्राप्ति होती है, जीव का सारा अज्ञान, ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है और उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य होता है मोक्ष प्राप्ति। सम्यक दर्शन ही मोक्ष प्राप्ति का राजमार्ग है। ज्ञान से आयी श्रद्धा बहुत अधिक प्रभावक होती है और केवल परम्परा से मिली श्रद्धा का प्रभाव आंशिक रूप में ही होता है। श्रद्धा लाने के लिए आगम सूत्रों के अर्थों का ज्ञान भी जरूरी है। ज्ञान से ही गहराई आती है और श्रद्धा का बल अपने आप बढ़ता है। सम्यक दर्शन होने के बाद जीव से न तो नर्क गति का बंध होता है और न ही त्रियंच गति का।



धर्म-कर्म का भी करें विस्तारः सिद्धांतनिधिश्री
प्रवचन सभा के दौरान साध्वीश्री सिद्धांतनिधिश्री ने कहा कि जिस प्रकार सांसारिक जीवनयापन करते हुए आपकी जरूरतों का दिनोंदिन विस्तार होता ही चला जाता है, उसी प्रकार धर्म-कर्म को भी विस्तारित किया जाना चाहिए। तभी एक गृहस्थ संतुलित जीवन जीते हुए श्रावक की कोटि में आ सकता है। धन-दौलत का हिसाब तो मनुष्य ने खूब किया, हिसाब मिलाने रात-रात बैठा लेकिन कभी अपने पाप और पुण्यों का भी हिसाब मिलाने के लिए वह एकांत में जाकर बैठा।

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