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93 की उम्र तक 50 हजार पेड़ लगाए दाऊद खान रामायणी ने

5 वर्ष पहले
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93 साल के दाऊद खान रामायणी धमतरी ही नहीं, छत्तीसगढ़ के लिए भी जाना-माना नाम है। लेकिन यह नाम सिर्फ इसलिए चर्चित नहीं है कि मुस्लिम होकर वे रामचरित मानस पर प्रवचन करते हैं। बल्कि इसलिए कि उनका प्रकृति प्रेम भी बेमिसाल है। अब तक उन्होंने 50 हजार पेड़ लगाए हैं। इनमें उनके हाथों रोपे गए सागौन के सैकड़ों पौधे अब बड़े हो चुके हैं और उनकी कीमत करोड़ों में हैं। वे दाऊद खान रामायणी की तरह शान से सिर उठाए खड़े हैं।

दैनिक भास्कर टीम दाऊद खान के घर पहुंची तो वे भोजन कर रहे थे। एकदम फुर्तीले और स्वस्थ। लगता ही नहीं कि 1923 की पैदाइश हैं। बताने लगे कि सातवीं में फेल हुए तो उनके टीचर पिता बहुत नाराज हुए और उनकी पढ़ाई छुड़वा दी। फिर भखारा के पास एक गांव में जमीन की रखवाली की नौकरी लगवा दी। उन्होंने सालभर फसलों की रक्षा मवेशियों व बंदरों से की। काम नहीं जमा तो भागकर रायपुर आ गए। एक कोयला दुकान में नौकरी की।

रायपुर से सरायपाली तक जाने वाली बस में कंडक्टर भी हो गए। फिर ड्राइवर बने और इस दौरान पिथौरा में सातवीं की परीक्षा दी। उनकी पढ़ाई शुरू करने में तब के एक अंग्रेज अफसर की बड़ी भूमिका थी। उनके बारे में बताते हुए दाऊद की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा कि अगर वह अंग्रेज मदद नहीं करता तो न पढ़ पाता, न टीचर बनता, न पेड़ लगाता और न ही रामायण से लेकर गुरु ग्रंथ साहिब तक का अध्ययन ही कर पाता। खैर, दाऊद पास होने लगे और पिता का गुस्सा भी पिघलता रहा। आखिरकार पिता ने दाऊद को ढूंढ ही लिया और वापस घर ले गए।

देशभर में सुना चुके हैं रामकथा
दाऊद देशभर में रामकथा सुना चुके हैं। वे इसके लिए विख्यात साहित्यकार पदुमलाल पुन्ना लाल बख्शी को श्रेय देते हैं। वे उन्हें गुरु भी मानते हैं। दाऊद खान इलाहाबाद की व्यास पीठ से रामकथा सुना चुके हैं। तब उन्हें 75 रुपए व 300 शालें पुरस्कार के रूप में मिली थीं।



ये 1950 की बात है। तब उन्हें रामायण र| पुरस्कार भी मिला था।

टीचर बनते ही हरियाली
दाऊद 1949 में शिक्षक बने। पहली पोस्टिंग कुरुद में हुई। उसके बाद खरेंगा, बटरेल, नगरी, भखारा, आमदी, लोहरसी, डौंडीलोहारा व खेरथाबाजार स्कूलों में पढ़ाया। धमतरी से लगे लोहरसी से रिटायर हुए। इन सभी गांवों के स्कूलों में दाऊद खान की यादें उनके लगाए पेड़ों से जिंदा हैं। लोहरसी के स्कूल में दाऊद खान ने जो पेड़ लगाए थे उनमें सागौन के 30 पेड़ अब करोड़ों की संपत्ति है।

यहां के हेडमास्टर आरपी शर्मा और टीचर जीआर पटेल व दिनेश अग्रवाल ने बताया कि जब तक दाऊद सर थे, स्कूल में खुशनुमा गार्डन था। वहां सब्जी लगाते थे। यह सब्जी टीचर से स्टूडेंट्स तक, सबमें बंटती थी। उनके साथ बरसों काम करके रिटायर हुए शिक्षक एसके सार्वा ने बताया कि सारे लोग दाऊद खान जैसे हो जाएं तो पर्यावरण का संतुलन बिगड़ नहीं सकता।

सेहत के राज
दाऊद इतने स्वस्थ हैं कि अब भी चश्मा नहीं लगा। पूछा तो उन्होंने हंसते हुए कहा - पिछले साल सितंबर में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भी यही सवाल पूछा था। तब उन्होंने कहा कि मैं कम खाता हूं, गम खाता हूं। सेहत का यही राज है। उन्होंने बताया कि अब तक उन्हें सर्दी भी नहीं हुई है। दाऊद खुद खाना बनाते हैं, घर की सफाई करते हैं। अपने कपड़े भी धो लेते हैं। पड़ोस की महिलाएं मदद करना चाहती हैं।

लेकिन उनसे आग्रह कर देते हैं कि काम नहीं करेंगे तो बीमार पड़ जाएंगे। बहरहाल, दाऊद की बड़ी बेटी कमरूनिशा रायपुर में डिप्टी कलेक्टर व छोटी बेटी बदरूनिशा सागर में तहसीलदार रही हैं। दोनों ही रिटायर हैं, दादी बन चुकी हैं। दोनों उनकी तरह स्वस्थ नहीं हैं और पूछती रहती हैं - अब्बा, आप इतने तंदुरुस्त कैसे रहते हैं?

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