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चातुर्मास में जो मिल रहा है, उसे सच्चे मन से ग्रहण कर समाज को बदलें

4 वर्ष पहले
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कम्युनिटी रिपोर्टर | रायपुर

संत शिरोमणी श्री रविशंकर महाराज ‘रावतपुरा सरकार’ ने चातुर्मास व्रत अनुष्ठान के 11वें दिन प्रार्थना के बाद कहा कि आप श्री रावतपुरा आश्रम में आए हैं, हमारी इच्छा है कि जब आप लोग यहां आए हैं तो कुछ न कुछ अपने आप में बदलाव लेकर जाएं। चातुर्मास में जो मिल रहा है उसे सच्चे मन से ग्रहण कर देश और समाज को बदलें। अपनी बुराइयों को सरकार के श्री चरणों में अर्पित कर, अच्छा व्यवहार, अच्छे बोलचाल, अच्छे संस्कार, नेक विचारों को ग्रहण करके जाएं। इससे जब आप घर-परिवार, समाज में जाएं तो वहां के माहौल, वातावरण को बदल सकें। आप में हुआ बदलाव परिवार-समाज में परिवर्तन के रूप में दिखना चाहिए, लोगों को ऐसा महसूस हो कि आप परिवार, समाज, राष्ट्र के लिए अच्छे कार्य कर रहे हैं, सही रास्ता, सही दिशा दे रहे हैं। परिवार, समाज, राष्ट्र के हित में आगे बढ़ रहे हैं। समाज में रहकर ऐसे सेवा कार्य करें जिससे समाज आप से प्रेरणा ले, आपके विचारों को सहमति मिले, लोग आपके द्वारा बताए हुए मार्ग का अनुसरण करें, धर्म के अनुकूल आचरण करें। वर्षों से चली आ रही कुरीतियों को समाप्त कर नई उमंग, नए उत्साह के साथ आगे बढ़ें।

धर्महीन व्यक्ति पशु के समान
रावतपुरा सरकार ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह संसार सत्य, धर्म, आस्था, विश्वास के पैरों पर खड़ा है, धर्म मानव जीवन के लिए कल्याणकारी है। धर्म सद्गुरू-ईश्वर के पास पहुंचने का सहज सरल मार्ग है। धर्म मानव जीवन के विकास की प्रक्रिया है। धर्म संसार और ईश्वर के मध्य का सेतु है। धर्म के माध्यम से मानव को उत्तम जीवन मिलता है। धर्म से हीन मनुष्य को पशु तुल्य माना गया है। धर्म से जुड़े बिना व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं हो सकता। ईश्वर प्राप्त नहीं हो सकता।



रावतपुरा सरकार ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि वर्तमान समय में इसका स्वरूप बदलने की कोशिश की जा रही है। धर्म का काम तोड़ना नहीं जोड़ना है। हर किसी में मानवता का भाव विकसित करना है। सभी के दुःख-दर्द संकट में सहयोग देना, सभी के लिए मंगल की कामना करना ही धर्म का सार है। सभी धर्म शास्त्र ईश्वर प्राप्ति के मार्ग दर्शक हैं। दुनिया में ऐसा कोई विभाजन नहीं है, दुनिया में सर्वत्र एकत्व है। मनुष्य अज्ञान के कारण भेद-भाव महसूस करता है। किसी प्रकार का भेद मन की कल्पना है। यह धर्म मानव के लिए दिशा है, मंजिल नहीं। दुनिया में कई ऐसे धर्म गुरु हैं, जो धर्म का उपदेश दे रहे हैं, व्याख्यान कर रहे हैं, लेकिन तत्वज्ञान से कोसों दूर हैं। तत्वज्ञान के अभाव में धर्म विकृत होकर, मानव सभ्यता के लिए अभिशाप सिद्ध हो रहा है।

व्रत अनुष्ठान में शामिल होने देशभर के श्रद्धालु आश्रम पहुंच रहे हैं।

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