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मौत के चार साल बाद मिला इंसाफ, सही वक्त पर मिलता तो प्रदेश के पहले डीजीपी होते चौबे

5 वर्ष पहले
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भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी स्व. विजय शंकर चौबे को समय पर न्याय मिलता, तो शायद वे प्रदेश के पहले डीजीपी होते। ये टिप्पणी अदालत ने की है। चौबे ने अपनी वरिष्ठता को लेकर करीब चालीस साल कानूनी लड़ाई लड़ी। उन्हें इंसाफ उनकी मौत के चार साल बाद मिला। उन्हें न्याय दिलाने के लिए उनकी धर्मप|ी पुष्पा चौबे लगातार संघर्ष करती रहीं। अदालत ने देर से न्याय मिलने पर अफसोस भी जाहिर किया।

चौबे के पक्ष में फैसला देते हुए अपने ताजा आदेश में केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण की मुख्य बैंच ने 1976 के स्थान पर वर्ष 1973 की स्थिति में वरिष्ठता देने का आदेश पारित किया है। आदेश में चौबे को 1973 की स्थिति में वरिष्ठता मिलने में हुए विलंब पर अफसोस भी जाहिर किया। न्यायाधिकरण ने उनकी वरिष्ठता के आधार पर सभी शेष|पेज 13



आर्थिक लाभ और आवश्यक राहत भी देने को कहा है। राष्ट्रपति पदक से सम्मानित चौबे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ संवर्ग के लोकप्रिय पुलिस अधिकारी थे।



सभी लाभ 1973 से दिए जाएं

उनकी प|ी पुष्पा चौबे ने पति को न्याय दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखी। उन्होंने इस सिलसिले में शासकीय सेवाओं के कानूनी मामलों के वरिष्ठ अधिवक्ता एस.एन. कौल जरिए कैट, नई दिल्ली की मुख्य बैंच में आवेदन किया। यहां उनके पक्ष में 1973 की स्थिति में उन्हें वरिष्ठता देने का आदेश पारित किया गया। अपने आदेश में न्यायाधिकरण की मुख्य बैंच ने यह भी कहा है कि चौबे को सभी आवश्यक लाभ 1973 से दिए जाएं। कैट ने इस बात पर दुख जताया कि उन्हें 1973 की वरिष्ठता से वंचित रखा गया, नहीं तो वे नए छत्तीसगढ़ राज्य के संभावित पहले डीजीपी होते।

नक्सल उन्मूलन व डकैतों के खिलाफ किए काम

चौबे का जन्म सारंगढ़ में हुआ। वे लोकप्रिय पुलिस अधिकारी रहे। भिण्ड और सतना में डकैत उन्मूलन अभियान, जबलपुर और इन्दौर की कानून व्यवस्था और तत्कालीन मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में नक्सल उन्मूलन अभियान में उनका अहम योगदान था। उन्हें केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल का महानिदेशक बनाया गया था। राष्ट्रपति के पुलिस पदक सहित कई सम्मान प्राप्त हुए। केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति के दौरान उन्होंने उतई (भिलाई नगर) में सी.आई.एस.एफ. के प्रशिक्षण केन्द्र के लिए जमीन प्राप्त करने में भी सफलता मिली। वह कई सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। भिलाई इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी (बी.आई.टी.) के वह संस्थापक न्यासी भी रहे। उन्होंने दुर्ग जिले में साक्षरता अभियान से जुड़कर काफी काम किया। वह 90 के दशक में भिलाई नगर साक्षरता समिति के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने भारतीय रेडक्रास सोसायटी की राज्य इकाई के अध्यक्ष के रूप में भी अपनी सेवाएं दी।

अब 1973 से आईपीएस माने जाएंगे
मध्यप्रदेश पुलिस सेवा में चौबे 1966 में नियुक्त हुए थे। उन्हें 1975 तक आईपीएस अवार्ड हो जाना था, लेकिन उन्हें वर्ष 1977 बैच का आईपीएस अवार्ड 1978 में दिया गया। उन्होंने इसे कैट के जबलपुर बैंच में चुनौती दी। कैट ने उन्हें 1976 से वरिष्ठता देने का आदेश पारित किया, लेकिन चौबे इस से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने लड़ाई जारी रखी। 2000 में वे फिर कैट, जबलपुर गए। कैट ने केन्द्र सरकार को उनके प्रकरण में प्रस्ताव भेजने का आदेश दिया। संघ लोकसेवा आयोग ने चौबे के प्रकरण में वर्ष 2003 में एक कमेटी बनाई। कमेटी ने उनकी वरिष्ठता 1973 से तय करने का आदेश दिया। कमेटी की अनुशंसा पर अमल के लिए दुर्भाग्यवश इस मामले में कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ और 2012 में चौबे का निधन हो गया।

स्व. वीएस चौबे

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