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दिखने में बैल के कूबड़ जैसी है ये पहाड़ी, कभी राजाओं का हुआ करता था रेस्टहाउस

बैल के कूबड़ की तरह होने के कारण इस जगह का नाम 'बैलाडीला' पड़ा। यहां की लौह खदान, विश्व के सबसे बड़े खदानों में से हैं।

Dainik Bhaskar

Sep 15, 2017, 11:53 PM IST
It is like a bull hump in the hills it was used to be the royal palace
रायपुर। वादियों के बीच सैर करने का अगर आपका मन है तो एक बार बस्तर के बैलाडीला माइन्स को जरूर घूम कर आए। ये पहाड़ी अपनी खूबसूरती के लिए काफी फेमस है लेकिन नक्सली एरिया होने के कारण कभी-कभी घटनाएं होती रहती हैं। राजा का थी एेशगाह...
- यहां की पहाड़ियों में उस वक्त के राजा प्रवीरचंद्र भंजदेव का रेस्ट हाउस रह चुका है। गर्मियों में राजा अपने काफिले के साथ बैलाडीला की पहाड़ियों में आराम करने आते थे।
- बैल के कूबड़ की तरह होने के कारण इस जगह का नाम बैलाडीला पड़ा। बैलाडीला की लौह खदान, विश्व के सबसे बड़े खदानों में शुमार है। ये बरसात के दिनों में मनोरम हो जाता है। घुमावदार रास्ता, घने जंगल, सर्पीली घाटियों से होकर आकाशनगर तक पहुंचना लोगों को रोमांचित करता है।
- बचेली से आकाशनगर के बीच सड़क को छूते हुए बादलों के बीच 22 किमी लंबी घाटी का सफर काफी रोमांचक होता है, जिसे देखने के लिए केवल बस्तर संभाग ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्यों से भी सैलानी आकाशनगर की सैर करने पहुंचते हैं।
- बस्तर के आदिवासी भी बैलाडीला में पाए जाने वाले पत्थरों से लोहा निकालते थे, उनके सभी औजार स्थानीय अयस्क से ही निर्मित होते आ रहे हैं
- 11 सेन्चुरी मे चोल वंशीय राजाओं ने बैलाडीला पहाड़ियों से लोहे का निकाल कर अस्त्र शस्त्र बनाने का कारखाना खोल रखा था।
22 किमी की दूरी एक घंटे में तय होती है
22 किमी की दूरी को तय करने में करीब एक घंटे लग जाते हैं। जानकारों की मानें तो इस साल विश्वकर्मा पूजा के दिन ओडिशा, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों से पर्यटकों के पहुंचने की संभावना है। एनएमडीसी के अधिकारियों ने बताया कि इस दिन के लिए कंपनी विशेष इंतजाम करती है। बाहर से आने वाले लोगों को कोई परेशानी न हो इसके लिए अलग से इंतजाम किए जाते हैं। गौरतलब है कि पिछले साल यहां पर तीन हजार से ज्यादा सैलानी आए थे।
विश्वकर्मा जंयती पर होती विशेष पूजा
बैलाडीला की पहाडियों पर जगह-जगह विश्वकर्मा जंयती के दिन पूजा होती है। मान्यता के अनुसार जयंती वाले दिन भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति की स्थापना की जाती है और अगले दिन मूर्ति का विसर्जन कर दिया जाता है।

साल में एक दिन खुलता है
विश्वकर्मा पूजन के दिन सभी माइंस में अवकाश रखा जाता है और जगह-जगह भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है। पूजन में शामिल होने के अलावा आकाश नगर और 40 किमी क्षेत्र में फैले माइंस एरिया की खूबसूरती निहारने और माइंस एरिया में काम करने वाली बड़ी-बड़ी मशीनों को देखने का मौका आम सैलानियों को मिल पाता है। 28 किमी लंबे घाट में सफर करना काफी रोमांचक अनुभव साबित होता है।

आगे की स्लाइड्स में देखें बैलाडीला की फोटोज...
बैल के कूबड़ की तरह है ये पहाड़। बैल के कूबड़ की तरह है ये पहाड़।
बैलाडिला माइन्स। बैलाडिला माइन्स।
वादियों के बीच इस माइन्स में पर्यटक घूमने जाते है। वादियों के बीच इस माइन्स में पर्यटक घूमने जाते है।
आसमान के बीचोंबीच यहां का सीन आर्कषक होता है। आसमान के बीचोंबीच यहां का सीन आर्कषक होता है।
आसमान के बीचोंबीच यहां का सीन आर्कषक होता है। आसमान के बीचोंबीच यहां का सीन आर्कषक होता है।
बैलाडिला माइन्स। बैलाडिला माइन्स।
बैलाडिला माइन्स। बैलाडिला माइन्स।
बैलाडिला माइन्स। बैलाडिला माइन्स।
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It is like a bull hump in the hills it was used to be the royal palace
बैल के कूबड़ की तरह है ये पहाड़।बैल के कूबड़ की तरह है ये पहाड़।
बैलाडिला माइन्स।बैलाडिला माइन्स।
वादियों के बीच इस माइन्स में पर्यटक घूमने जाते है।वादियों के बीच इस माइन्स में पर्यटक घूमने जाते है।
आसमान के बीचोंबीच यहां का सीन आर्कषक होता है।आसमान के बीचोंबीच यहां का सीन आर्कषक होता है।
आसमान के बीचोंबीच यहां का सीन आर्कषक होता है।आसमान के बीचोंबीच यहां का सीन आर्कषक होता है।
बैलाडिला माइन्स।बैलाडिला माइन्स।
बैलाडिला माइन्स।बैलाडिला माइन्स।
बैलाडिला माइन्स।बैलाडिला माइन्स।
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