UN ने लिखा पत्र, भारत में यहांब च्चों को ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे नक्सली

4 वर्ष पहले
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रायपुर.  नक्सलियों द्वारा बच्चों को अपने कैडर में शामिल करने, लड़ाई का प्रशिक्षण देने, उन्हें ढाल की तरह इस्तेमाल करने और उनके हताहत होने की घटनाओं ने संयुक्त राष्ट्र को भी चिंतित कर दिया है। यूएन महासचिव एंटोनियो गुतेरस ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर बच्चों की नक्सलियों से मुक्ति के उपाय करने कहा है। यूएनओ जनरल सेक्रेट्री एंटोनियो गुतेरस ने दो  दिन पहले गुरुवार को ही  सुरक्षा परिषद को भेजी 2016 की सालाना रिपोर्ट में कहा है कि नक्सली छत्तीसगढ़ और झारखंड में बच्चों को ढाल की तरह उपयोग कर रहे हैं जिसमें बच्चों के हताहत होने की भी सूचना है। लेकिन, इनकी संख्या का अभी पता नहीं चल सका है।  छत्तीसगढ़ के बस्तर में स्थित स्कूलों में नक्सली ट्रेनिंग कैंप चला रहे हैं
 
वे अपने कैडर में बच्चों को भरती कर रहे हैं। जंगलों में बच्चों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही है।  गुतेरस की इस  रिपोर्ट के मुताबिक  बच्चे हथियारबंद समूहों और सरकार के बीच विशेष रूप से छत्तीसगढ़ और झारखंड में हो रही हिंसा से प्रभावित हो रहे हैं। साल 2016 की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल नक्सलियों या अन्य हथियारबंद समूहों द्वारा बच्चों के इस्तेमाल में कमी आई है और अब छह राज्यों की तुलना में सिर्फ दो राज्यों में ही इनका इस्तेमाल किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की 2015 की रिपोर्ट में तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा था कि नक्सली बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में छह साल तक के बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं। 
गुतेरस की  रिपोर्ट में सरकारों की तुलना में आतंकवादियों और अन्य हथियारबंद समूहों द्वारा बच्चों के शोषण के अधिक मामले हैं। उन्होंने लिखा है कि मैं भारत सरकार से इन आतंकवादी संगठनों से बच्चों को बचाने के लिए उचित तंत्र विकसित करने का आग्रह करता हूं। मैं सरकार से किसी भी तरह की हिंसा से बच्चों को बचाने का भी आग्रह करता हूं। गुतेरस ने इस बात को चिंताजनक बताया है कि नक्सली छत्तीसगढ़ में कई स्कूल चला रहे हैं, और वे उसमें पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में बच्चों को लड़ाई का प्रशिक्षण दे रहे हैं।

ऐसे तैयार करते हैं बच्चों को.. 
भास्कर के पास उपलब्ध जानकारी के मुताबिक माओवादी 8-9 साल के स्कूली बच्चों को साथ ले जाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ मोटिवेट करते हैं। ऐसे ट्रेंड बच्चों को वे बाल संघम सदस्य कहते हैं। ये बच्चे माओवादियों के लिए कारगर मुखबिर के रूप में काम आते रहे हैं। सुरक्षा बल भी इनकी उम्र को देखते हुए शक भी नहीं कर पाते। माओवादी इन्हें बंदूक और एलएमजी जैसे हथियार चलाना सिखाते हैं। बच्चे, युवावस्था तक पहुंचते हार्डकोर नक्सली के रूप में तैयार हो जाते हैं। और इनकी घर वापसी की संभावना खत्म हो जाती है। पिछले साल का ही वाकया है कि बीजापुर के उसूर, पुजारी कांकेर और बासागुड़ा की आश्रम शालाओं के बच्चों को माओवादियों ने एक-एक सप्ताह की ट्रेनिंग दी थी। वहीं पिछले माह गाड़पा के ट्रेनिंग कैंप में माओवादियों ने 90-100 बच्चों को ट्रेंड किया था। इसकी सूचना पर कलेक्टर ने शिक्षा अमले को क्षेत्र के स्कूलों में जाकर बच्चों की काउंसिलिंग के निर्देश दिए थे। और इसमें लापरवाही के लिए 4 आश्रम अधीक्षकों को बदला भी था।
 
 
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