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बात 1988की है। जगह: जबलपुरऔर भोपाल के बीच चलती ट्रेन

6 वर्ष पहले
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बात 1988की है। जगह: जबलपुरऔर भोपाल के बीच चलती ट्रेन में। दोस्त के साथ एनआईआईटी में दाखिले के लिए ट्रेन से भोपाल जा रहा था। वो इंदौर जा रही थी। ऊपर वाले से बड़ा डायरेक्टर कोई नहीं। इस फिल्म का डायरेक्टर भी वही था। मेरे ठीक सामने की सीट पर ही वो अपने बंगाली बाबू पिता बीसी दास के साथ बैठी थी। मेरी प्रेम कहानी के विलेन वो ही थे। सफर में उन्हीं से बातें होने लगीं। अंशु मुझे देख रही थी। मैं तो दिल दे चुका था। रात में जब भोपाल में उतरा तो एक मैग्जीन में अपना नाम पता लिख दिया पर कुछ नहीं हुआ। मैं उसे भूल नहीं पा रहा था और मैडम तो लगभग भूल ही चुकी थीं। उम्मीद की नई किरण एक दिन जबलपुर की सड़कों पर लूना पर सवार नजर आई। हमने भी अपनी मोटरसाइकल बाजू में लगा दी। पूछा, पहचाना मुझे। उसकी बहन साथ थी। मैंने मिलने कहा तो उसने घबराकर हां कर दिया। मदर मैरी की मूर्ति के पास मैं और मेरी तन्हाई ही थे, वो नहीं आई। पता किया ताे जानकारी मिली की मैडम जी सुबह ट्यूशन भी जाती हैं। एक बार कॉफी हाऊस में मुलाकात हुई। मैंने प्रपोज कर दिया। मैडम जी तो नाराज होकर चली गईं। अब तो इस लव स्टोरी का दि एंड होता दिख रहा था। तब उसकी एक दोस्त के जरिए मैंने संदेश भिजवाया। पर कोई फायदा नहीं हुआ। एक दिन ट्यूशन के बाहर अपने हाथों से लिखा पैगामे मुहब्बत उन्हें पकड़ा दिया। कहा तुमसे शादी करना चाहता हूं। राजी हो तो मदर मैरी की मूर्ति के पास जाना। जवाब नहीं आया पर मदर मैरी की मूर्ति के पास अंशु आई। प्यार की नई कहानी की कैंडल हम दोनों ने यहीं से जलाई। अभी सब ठीक ही हुआ था कि अचानक उसके पिता जी का ट्रांसफर रायपुर हो गया। मेरी नौकरी दिल्ली में लग गई। मैं दिल्ली चला गया। वो रायपुर गई। ट्रेनिंग के बाद कंपनी मुझे देश के दूसरे शहरों में भेजने वाली थी। महीनों बाद जैसे तैसे रायपुर पहुंचा। सीधे अंशु के घर गया। उसके पिताजी से बोला हमें शादी करनी है। बहस हुई, मैं बोल पड़ा जज का बेटा हूं, पक्का जबलपुरिया। हां बोल दो वरना तुम्हारी बेटी भगा ले जाऊंगा। इससे बात और बिगड़ गई। सब रिश्ते के खिलाफ हो गए। मेरी मां कहती बंगाली लड़की नहीं चलेगी। लड़की के पिता की जिद थी कि सिंधी नॉट अलाउड। जैसे-तैसे सबको मनाया। रिश्तेदारों से कहा गया अरेंज मैरिज है। बदनामी के डर से शादी बड़ौदा गुजरात में की गई। फिर हमें घर से दूर कर दिया गया। मुश्किल दौर का सामना हमने डटकर हंसते-हंसते किया। कुछ सालों बाद घरवालों ने स्वीकार कर लिया। तीनों बेटियों की शादी के बाद मेरे फादर इन लॉ और मदर अकेले हो गए। रिटायरमेंट के बाद वो मेरे साथ ही रहे। उन्होंने मुझे बेटे से बढ़कर प्यार और सम्मान दिया। उन्होंने यहां तक की इच्छा जताई कि उनका अंतिम संस्कार बंगाली नहीं, बल्कि सिंधी रीति रिवाजों से हो। हमने उनकी ये अंतिम इच्छा पूरी भी की। आज भी हमारे घर में उनका कमरा है। - अनिल जोतसिंघानी, रायपुर

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