पैरों से लिखी इबारत पर हाथ वाले हैरान!
चंपेश्वरनिषाद। उम्र 22 साल। पता- रायपुर से 45 किमी दूर राजिम का गांव कौंदकेरा साधारण किसान परिवार का एक ऐसा हुनरमंद, जिसने अपनी तदबीर से तकदीर बदल ली। कुदरत ने पैदा होते ही हाथ छीन लिए। जन्म से ही कोहनी के बाद दोनों हाथ नहीं। फिर पढ़ा, लिखा और आज इंजीनियर बनने के आखिरी छोर पर है। दिमाग सोचने पर मजबूर करता है कि जब हाथ नहीं, तो लिखा कैसे? लिखा और जमकर लिखा। अपने पैरों से। रायटिंग भी इतनी सुंदर, कि आप और हम नहीं लिख सकते। इतनी स्पीड कि वो भी औरों की तरह तीन घंटे में ही एग्जाम देकर बाहर निकलता है। फिलहाल मुजगहन के शंकराचार्य इंजीनियरिंग कॉलेज के आईटी सेक्शन में छठवे सेमेस्टर में है।
अब जिद आईएएस बनने की है। जब चंपेश्वर का जन्म हुआ, तो पिता श्यामू और मां अनसूईया फफक-फफक कर रोने लगे। हाथों में उंगलियां थी ही नहीं। मां के गर्भ में शरीर पूरा नहीं बन पाया। जब स्कूल जाने की उम्र हुई, माता-पिता ने सोचा, शेष|पेज10
पढ़नातो सीख लेगा, पर लिखना कैसे? क्या परीक्षा में उसे हर बार राइटर लेना पड़ेगा? लेकिन ऐसा कुछ नहीं करना पड़ा। खुद चंपेश्वर ने अपने पैरों की उंगलियों को हाथों की उंगलियों में तब्दील कर दिया। हायर सेकेंडरी तक की पढ़ाई राजिम के सरकारी हिंदी मीडियम स्कूल में हुई। गणित और विज्ञान विषयों में रूचि थी। इंजीनियरिंग करना चाहता था। 2011-12 में पीईटी परीक्षा दी। सलेक्शन हो गया।
आईएएस बनने का सपना
चंपेश्वर की आंखों में अब आईएएस बनने का सपना है। अगले साल वे इंजीनियर बन जाएंगे। उन्होंने अभी से अखबार पढ़ना शुरु कर दिया है। जनरल नालेज की किताबें पढ़कर नोट्स तैयार कर रहे हैं। पीएससी के साथ ही यूपीएससी की परीक्षा देने का मन उन्होंने बना लिया है। कहते हैं कि अपने धमतरी जिले का डीएम बनकर राजिम के अपने गांव में बच्चों के लिए स्कूल खोलूंगा।
डा. अनूप भल्ला ने निखारा चंपेश्वर
चंपेश्वर की प्रतिभा को पहचानने वाले जोहरी वन विभाग के एडिशनल पीसीसीएफ डा. अनूप भल्ला हैं। उन्होंने 9 वीं कक्षा के बाद से ही चंपेश्वर की पढ़ाई का खर्च उठा लिया। लगातार मोटिवेट किया। अब इंजीनियरिंग की पढ़ाई का खर्च भी वे ही उठा रहे हैं। राजिम के कौनकैरा गांव में दौरे के दौरान वे चंपेश्वर से मिले थे। शंकराचार्य में एडमिशन के बाद कालेज के चेयरमैन निशांत त्रिपाठी भी उनकी मदद कर रहे हैं। डा. भल्ला कहते हैं कि वे बरसों से गरीब बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाते रहे हैं। वे ऐसे बच्चों को ढूंढते हैं, जिनमें उन्हें कुछ बनने की ललक नजर आती है। चंपेश्वर की तरह ही थानेश्वर वर्मा जो उनके चपरासी का लड़का है। उसकी पढ़ाई का खर्च भी उन्होंने उठाया। आज वह रुंगटा कालेज से सीविल ब्रांच में बीई कर चुका है। शंकराचार्य कालेज में पढ़ा रहा है। अगले साल वह भी यूपीएससी की परीक्षा में बैठेगा।
हिंदी मीडियम था, तो अंग्रेजी सीखी
चंपेश्वर ने हायर सेकेंडरी राजिम के हिंदी मीडियम स्कूल से की। जब इंजीनियरिंग की आईटी ब्रांच में एडमिशन हुआ, तो पूरी पढ़ाई इंग्लिश में करनी थी। पैर से हिंदी लिखने की आदत तो थी, मगर अंग्रेजी में दक्ष नहीं थे। इस कारण पहले दो महीने हर दिन चार से छह घंटे तक अंग्रेजी लिखने का अभ्यास किया। तब जाकर उनकी अंग्रेजी अच्छी हुई और लिखने की स्पीड भी बढ़ी।
टाइम मिला तो मार ली बाजी
चंपेश्वर जमीन पर बैठकर लिखता है। चौथे सेमेस्टर के पेपर के दौरान वह खाली कमरे में बैठकर लिख रहा था। तीन घंटे में पेपर खत्म हुआ। इनविजिलेटर भूल गए कि दूसरे कमरे में चंपेश्वर पेपर लिख रहा है। 15 मिनट बाद उन्हें ध्यान आया। चंपेश्वर को भी वक्त का पता नहीं चला। उसने 9 प्रश्न हल कर दिए। उस पेपर में उसे 79 प्रतिशत अंक हासिल हुए।
मनुष्य तन से नहीं, मन से होता है विकलांग
पैरों की उंगलियों के बीच कलम फंसाकर लिखता चंपेश्वर।
ऐसे दिया एग्जाम
बकौल चंपेश्वर, उसे सबसे ज्यादा तकलीफ पहले सेमेस्टर में हुई। पैर से लिखा। अधूरे हाथों से कैलकुलेटर और स्केल का इस्तेमाल किया। मुंह में कलम दबाकर ड्राइंग बनाई। तब सवाल हल हुए। परीक्षा देने से पहले बड़ा डर ये था कि तीन घंटे ही उसके लिए भी थे, जैसे दूसरे सामान्य परीक्षार्थियों के लिए। सवाल दस थे। सभी पेपर में 6-7 प्रश्न ही बनाए, लेकिन सभी में पास हो गए। 58 प्रतिशत अंक मिले। इसके बाद तो हर सेमेस्टर में स्पीड बढ़ा दी। अब वे हर पेपर में 7 से 8 प्रश्न हल करते हैं। चंपेश्वर कहते हैं कि थोड़ा टाइम एक्स्ट्रा दिया जाए तो वे पूरे 10 प्रश्न हल कर सकते हैं। पेपर में ड्राइंग भी बनानी पड़ती है। ज्यादा वक्त इसी में लग जाता है।
भास्कर खास