पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

ट्रेनों में अवैध तरीके से खाना पहुंचा रही हैं कंपनियां, रेलवे नहीं कर रहा कार्रवाई

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
रायपुर. चलती ट्रेन में जिस भी कंपनी से आप खाना मंगा रहे हैं, उसके लिए रेलवे कहीं से भी जिम्मेदार नहीं होगा। न खाने की क्वालिटी पर और न ही उसको खाने के बाद आपकी सेहत पर पड़े नुकसान पर। रेलवे बोर्ड ने स्पष्ट कर दिया है कि कंपनियां रेलवे की डायल-ए-मिल योजना का हवाला देकर अनधिकृत तरीके से अपना धंधा चला रही हैं, जबकि ऐसी कोई योजना शुरू ही नहीं की गई है। बिलासपुर मुख्यालय ने तो बाकायदा पूरे जोन को इस संबंध में पत्र भी जारी किया है।
पिछले डेढ़ साल में देशव्यापी स्तर पर चार निजी कंपनियां यात्रियों की बर्थ तक खाना पहुंचाने के धंधे में कूद चुकी हैं। कमसुम, ट्रैवलखाना डॉट कॉम, थालीवाला डॉट कॉम और मेराफूडच्वॉइस डॉट कॉम। सभी का दावा है कि रेलवे ने ही इसकी अनुमति उन्हें दी है। लेकिन रेलवे इससे साफ इंकार कर रहा है। ट्रेनों में कमसुम नाम की कंपनी ने सबसे पहले 1 अप्रैल 2013 से ऑनलाइन और फोन कॉल के माध्यम से खाना देने की शुरुआत की।
भास्कर ने पड़ताल में पाया है कि कमसुम ने अपनी वेबसाइट पर इंडियन रेलवे टूरिज्म एंड कैटरिंग कॉर्पोरेशन (आईआरसीटीसी) द्वारा मिले लाइसेंस का हवाला दिया है। आईआरसीटीसी रेलवे की सिस्टर कंसर्न कंपनी है और यही अधिकृत तौर पर स्टेशनों में फूड प्लाजा चलाती है। रेलवे बोर्ड के अफसरों का कहना है कि न तो कमसुम और न ही दूसरी किसी निजी कंपनी को उसने ट्रेनों में खाना सप्लाई करने की इजाजत दी है। ट्रेन में खाना पहुंचाना पूरी तरह से अनधिकृत है।
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर मुख्यालय की ओर से इसी महीने एक पत्र जारी किया गया है। इसमें कहा गया है कि चलती ट्रेनों में यात्रियों को जो खाना परोसा जा रहा है, उसकी जानकारी रेलवे को नहीं है। इस तरह की कोई योजना रेलवे संचालित ही नहीं कर रहा है। उधर, नाम न छापने की शर्त पर पेंट्रीकार के कई ठेकेदारों ने बताया कि रेलवे के पास इसके लिए कोई ठोस नीति नहीं है। ट्रेनों में खाना सप्लाई करने वाली केटरर कंपनियां अपने आप को रेलवे से संबद्ध बताती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि रेलवे के सह पर ही डायल-ए-मील योजना चल रही है।
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की ओर से यह स्पष्ट किया जाता है कि चलती ट्रेनों में ऑनलाइन व मोबाइल से खाना मंगाने की डायल-ए-मील नाम की कोइ भी योजना संचालित नहीं की जा रही है। ऐसे में यात्रियों द्वारा खाने की गुणवत्ता से लेकर अन्य किसी भी मामले के लिए रेलवे जिम्मेदार नही है।
बीमार हुए तो रेलवे नहीं जिम्मेदार
केटरर कंपनियों का दावा

- कमसुम डॉटकॉम: हमारी कंपनी आईआरसीटीसी से मान्यता प्राप्त है। रेलवे ने ही ट्रेनों में खाना सप्लाई करने का लाइसेंस दिया है।

- ट्रैवलखाना डॉट कॉम: रेलवे की मदद से ही हम ट्रेनों में खाना पहुंचा रहे हैं।

- थालीवाला डॉट कॉम: हमारी कंपनी रेलवे द्वारा मान्यता प्राप्त है।

- मेराफूडच्वॉइस डॉट कॉम: रेलवे से हमारी कंपनी को मान्यता मिली है।
नोट- भास्कर संवाददाता ने वेबसाइट पर दिए नंबरों पर फोन किया। कॉल रिसीव करने वाले ने उपरोक्त बातें कहीं। किसी ने भी अपने मैनेजर या मालिक का न कोई कॉन्टेक्ट नंबर दिया और न ही बात कराई।
सुलगते सवाल

- सभी कंपनियां रेलवे से मान्यता मिलने का दावा कर रही हैं। अगर यह झूठ है तो रेलवे इस मामले में चुप क्यों है?

- रेलवे को करोड़ों के राजस्व का नुकसान हो रहा है, फिर भी वह कार्रवाई क्यों नहीं कर रही?
- रेलवे की अनुमति के बिना क्या निजी कंपनियां ट्रेनों में खाना सप्लाई कर सकती हैं ? कहीं रेलवे की इसमें मिलीभगत तो नहीं?
करोड़ों का नुकसान, फिर भी दी खुली छूट

केटरर कंपनियां ग्राहकों से 20 प्रतिशत तक सर्विस टैक्स भी वसूल रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इसका एक फीसदी भी रेलवे को राजस्व के तौर पर नहीं मिल रहा है। अपनी वेबसाइट में कोई कंपनी 200 तो कोई 600 यात्रियों को खाना पहुंचाने का दावा कर रही है।
जितनी कंपनियां, उतने रेट भी। यह 150 रुपए से लेकर 350 रुपए थाली तक हैं। कंपनियां अगर हम न्यूनतम 150 रुपए थाली और औसतन 300 ग्राहकों के हिसाब से भी गणना करें तो रोजाना करीब 45 हजार रुपए का खाना एक कंपनी सप्लाई कर रही है। इसका सर्विस टैक्स महीने का 9 हजार रुपए रोजाना और महीने का दो लाख 70 हजार रुपए हो रहा है। अभी चार प्रमुख कंपनियां इस धंधे में लगी हैं। यानी 10 लाख 80 हजार रुपए से ज्यादा का नुकसान रेलवे को सिर्फ सर्विस टैक्स का हो रहा है। इतना ही नहीं, ट्रेनों में पेंट्रीकार चलाने का ठेका रेलवे 5 से 10 करोड़ रुपए में देता है। इसका नुकसान अलग से। इसके बावजूद रेल प्रशासन चुप है।

सीधी बात : कंपनियां भ्रम फैलाकर चला रही धंधा : अनिल सक्सेना, प्रवक्ता, रेलवे बोर्ड नई दिल्ली
- चलती ट्रेनों में खाना सप्लाई कर रहीं कंपनियों को क्या रेलवे ने अनुमति दी है ?
रेलवे ने किसी भी कंपनी को ट्रेनों में खाना पहुंचाने की अनुमति नहीं दी है। जो यह कर रहे हैं, वह अनधिकृत है।

- कंपनियों का कहना है कि रेलवे की ही डायल-ए-मील योजना के तहत ऐसा किया जा रहा है।
रेलवे ने तो डायल-ए-मील जैसी कोई योजना ही नहीं चलाई है। कंपनियां लोगों में भ्रम पैदा कर अपना धंधा चला रही हैं।
- अनधिकृत वेंडर पर कार्रवाई होती है, इन कंपनियों पर क्यों नहीं?
लोग निजी तौर पर फोन कर ट्रेनों में खाना मंगा रहे हैं। इसके लिए रेलवे जिम्मेदार नहीं है। वैसे अब ठोस नियम बनाने पर विचार चल रहा है।