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हनुमान नगर में 144 मकान, नया फ्लोर बनाने की भी इजाजत नहीं

7 वर्ष पहले
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रायपुर. राजधानी में सोसायटी से जमीन लेकर मकान बनाने वालों का अरसे से दबा हुआ दर्द भास्कर की खबर पढ़ने के बाद उभरकर सामने आ गया है। कालीबाड़ी स्कूल के ठीक सामने हनुमान नगर सोसायटी में दैनिक भास्कर की टीम पहुंची तो वहां के निवासियों का दर्द उनकी आंखों में झलक आया। शासन के 2009 में सोसायटी में मकान लेने वाले लोगों को बी-1 व खसरा नंबर के साथ नामांतरण कराने के फैसले ने पूरी कालोनी के लोगों की जिंदगी की रफ्तार पर ही ब्रेक लगा दिया है।

हनुमान नगर में अधिकांश कारोबारी तबके के लोगों ने अपने मकान बनाए हैं। शहर के बाजारों के काफी करीब हनुमान नगर बसा हुआ है। कोई भी मकान 50 लाख से दो करोड़ रुपए की लागत से कम का नहीं है। इनमें रहने वाले कुछ लोग अपना मकान बेचना चाहते हैं, रेनोवेशन कराना चाहते हैं, मकान का बंटवारा कराना चाहते हैं, ऊपरी मंजिल का निर्माण करना चाहते हैं। अधिकांश लोगों ने तहसील दफ्तर में कागजात जमा कर दिए हैं। पेशी भी हो गई है। मगर सरकारी काम की धीमी रफ्तार और चार साल पहले बने नए नियम की वजह से उनका नामांतरण नहीं हो रहा है। इस वजह से इस सोसाइटी के तकरीबन पांच दर्जन परिवार परेशान हैं।
नए नियम बनने से पहले

पुराने नियमों के तहत सोसायटी पूरे खसरे की जमीन को मिलाकर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से लेआउट पास करा लेती थी। एक ही जमीन के टुकड़े में कई बार अनेक खसरे होते थे। उस खसरे के टुकड़े में मकान के साथ ही रोड व रास्ते की जमीन, गार्डन, मंदिर, व्यवसायिक परिसर की जमीन होती थी। राजस्व अभिलेखों में खसरे के चिह्नांकन पटवारी और आरआई नहीं कर पा रहे हैं। अब नए सिरे से जब तक सोसायटी का सर्वे नहीं होगा तब तक समस्या दूर नहीं होगी। यही वजह है कि नामांतरण के आवेदन तहसील दफ्तर में लंबित पड़े हुए हैं।
नियम के पीछे अच्छी सोच

गृह निर्माण समितियों की जमीनों के सौदों में धोखाड़ी व छलकपट के मामले काफी बढ़ गए थे। एक ही जमीन को सोसायटी के पदाधिकारी कई लोगों को बेच रहे थे। चूंकि खसरा नंबर नहीं रहता था केवल प्लाट नंबर के आधार पर पदाधिकारी अलाटमेंट लेटर जारी कर देते थे। इस वजह से सरकार ने बी-1 व खसरा नंबर का नियम बना दिया, ताकि जमीन संबंधी धोखाधड़ी की तमाम आशंकाएं समाप्त हो जाएं तथा लोगों की कमाई धोखेबाजों की जेब में नहीं जा सके।
मकान मालिकों को इसलिए आईं परेशानियां

जब लोगों ने सोसाइटी से प्लाट खरीदकर रजिस्ट्री कराई, तब जमीन सरकारी रिकार्ड में केवल सोसायटी के नाम पर ही चढ़ी थी। अर्थात, जमीन को बांटकर अलग-अलग लोगों के नाम पर सरकारी रिकार्ड में नहीं चढ़ाया गया। लोगों ने भी आपत्ति नहीं की क्योंकि तब नियमों में यह मान्य था। नए नियम बनने से पहले सरकारी एजेंसियों को सोसाइटी के सारे प्लाट रिकार्ड में लोगों के नाम पर चढ़ा देने चाहिए थे। सिविल लायर ठाकुर आनंद मोहन सिंह के अनुसार सरकारी अमले ने ऐसा नहीं किया, जिसे लोग भुगत रहे हैं।