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एमआरआई के लिए नहीं हो रहा था जरूरी नियमों का पालन

7 वर्ष पहले
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रायपुर. अंबेडकर अस्पताल में मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ हो रहा है। 12 करोड़ रुपए की लागत से खरीदी गई थ्री टेस्ला एमआरआई मशीन लगाने से पहले जरूरी मानकों का ध्यान नहीं रखा गया। इस मशीन के 20 मीटर के दायरे में लोहे का कोई सामान नहीं होना चाहिए, इससे रिपोर्ट प्रभावित होती है। सालभर इसे नजरअंदाज कर जांच करते रहे।
इसी महीने एमआरआई मशीन से एक महिला घायल हुई तो जांच शुरू हुई। दिल्ली से एक टीम बुलाई गई। इसके बाद अस्पताल की चारदीवारी और रेडियोलॉजी विभाग के पास लगे लोहे के ग्रिल हटाए जा रहे हैं। जबकि विभाग में ही कुर्सी समेत लोहे के कई साजो-सामान पड़े हैं। कमरे के बाहर जनरेटर रूम हैै। गाड़ियां भी पास में ही पार्क की जा रही हैं। मरही माता चौक की ट्रैफिक भी इस दायरे में है। अब अस्पताल प्रबंधन कह रहा है कि लाहे के सारे सामान हटाएंगे।
दिल्ली से जांच टीम आई थी
एमआरआई रिपोर्ट प्रभावित हो रही थी। दिल्ली से आई जांच टीम ने लोहे के सामान हटाने के लिए कहा है। - डॉ. एके चंद्राकर, डीन, पं. जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडिकल कॉलेज, रायपुर
बीमारी का पता नहीं चल रहा थाजांच में पिक्चर क्लीयर नहीं आ रही थी। इससे बीमारी का पता नहीं चल रहा था। दोबारा एमआरआई करवानी पड़ती थी। - डॉ. विष्णु दत्त, विभागाध्यक्ष, रेडियोलॉजी, अंबेडकर अस्पताल
जनरेटर रूम और ट्रैफिक से अभी भी प्रभावित हो रही है जांच रिपोर्ट
डीबी स्टार टीम ने पड़ताल में पाया कि अंबेडकर अस्पताल में बिना योजना और जांच के ही कोई भी काम शुरू करवा दिया जाता है। रेडियोलॉजी विभाग में 12 करोड़ रुपए की लागत से थ्री टेस्ला एमआरआई मशीन खरीदी गई। सालभर तक इससे जांच करते रहे। 8 सितंबर को एक महिला मरीज के परिजन लोहे का स्ट्रेचर लेकर अंदर आ गए तो मशीन में लगी मैग्नेट ने खींच लिया। इससे महिला गंभीर रूप से घायल हो गई और इलाज के लिए दिल्ली एम्स भेजा गया। इसके बाद से अस्पताल परिसर से लोहे की ग्रिल हटाने की कवायद शुरू की गई। तर्क दिया जा रहा है कि इससे एमआरआई जांच रिपोर्ट प्रभावित हो रही है। जबकि रेडियाेलॉजी विभाग में ही लोहे की कुर्सियां समेत अन्य साजो सामान पड़ा हुआ है।
विभाग के बाहर ही गाड़ियों की पार्किंग हो रही है। दीवार से लगा जनरेटर रूम है। इसे लेकर विभागाध्यक्ष डॉ. विष्णुदत्त से बात की गई। उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले दिल्ली से एक टीम जांच के लिए आई थी। इसमें बताया गया कि 20 मीटर तक लोहे का कोई सामान नहीं होना चाहिए। इस दायरे में गाड़ियां भी नहीं खड़ी करनी है। लोहे का असर एमआरआई मशीन में लगे मैग्नेट पर होता है। इससे टेस्ट में कई बार मरीजों की बीमारी का पता नहीं चल पा रहा है।
इस वजह से पीडब्ल्यूडी को सड़क किनारे लगी ग्रिल हटाने के लिए लिखा गया है। एक हिस्से में इसे निकाल भी दिया गया है। जबकि इन्हें सालभर पहले ही 20 लाख रुपए की लागत से लगाया गया था। जब विभागध्यक्ष से पूछा गया कि मशीन लगाने से पहले जांच नहीं करवाई गई थी तो बोले, उस समय क्या हुआ इसकी जानकारी नहीं है। हादसे के बाद जांच की गई। उधर पीडब्ल्यूडी के कार्यपालन अभियंता कह रहे हैं कि उन्हें ग्रिल हटाने के लिए पत्र मिला है और इसे हटाने को लेकर काम चल रहा है।
तीन से पांच हजार रुपए शुल्क
अंबेडकर अस्पताल में एमआरआई जांच के लिए तीन से पांच हजार रुपए तक शुल्क लिया जाता है। बिना कंट्रास लगाए जांच करने पर तीन हजार लगता है। इसमें कई बीमारियां पकड़ में नहीं आती हैं। कंट्रास टेस्ट के लिए पांच हजार रुपए लगता है। जिस अंग में समस्या होती है, रिपोर्ट में वहां सिग्नल इंडिकेट करता है। डॉक्टर कंट्रास टेस्ट के लिए कहते हैं।
जटिल समस्याओं की जांच के लिए एमआरआई
मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) मशीन का उपयोग शरीर की आंतरिक जांच के लिए किया जाता है। न्यूक्लीयर मैग्नेटिक रेजोनेंस प्रॉपर्टी के कारण यह शरीर के अंदर अणु के केंद्र की तस्वीर लेने में सक्षम है। रेडियोलॉजिस्ट विशेष रूप से ब्रेन और स्पाइनल कॉर्ड संबंधी जटिल समस्याओं की जांच इसके माध्यम से करते हैं।
आगे की स्लाइड में देखिए एमआरआई में किस वजह से आ रही परेशानी की तस्वीरें...