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पहली से 8 वीं तक देनी होंगी परीक्षाएं, सरकारी स्कूलों में इसी सत्र से नई व्यवस्था

7 वर्ष पहले
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रायपुर. राज्य में पहली से आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों को भी अब परीक्षाएं देनी होगी। सरकार ने जनरल प्रमोशन का सिस्टम खत्म करने का निर्णय लिया है। 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद पहली से आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए परीक्षा लेना और फेल पास करने का सिस्टम बंद कर दिया गया है। बच्चों का टेस्ट लेने के बाद उन्हें ग्रेडिंग देकर अगली कक्षा में प्रमोट किया जा रहा है।
सरकार ने इसी सिस्टम में बदलाव करने की तैयारी की है। नई व्यवस्था इसी सत्र से लागू होगी। हालांकि अब भी किसी भी विद्यार्थी को फेल नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सोमवार को राजभवन में यह घोषणा की। शिक्षकों को राज्य सम्मान देने के लिए आयोजित समारोह में उन्होंने कहा कि वर्तमान में पहली से पांचवीं तक बिना परीक्षा लिए जनरल प्रमोशन दिया जा रहा था। अब इसे बंद किया जा रहा है। बच्चों को तिमाही, छमाही और साल पूरा होने पर टेस्ट देने ही होंगे। स्कूलों के लिए तय सिलेबस को समय पर पूरा करना होगा।
यदि शिक्षक कोर्स पूरा करने में
पिछड़ते हैं तो उन्हें एक्सट्रा क्लास लेकर कोर्स पूरा करना होगा। राज्य में शिक्षा की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर यह फैसला किया गया है। सरकार इस साल शिक्षा गुणवत्ता वर्ष मना रही है। उधर, शिक्षा सचिव सुब्रत साहू ने कहा कि अभी शासन स्तर पर घोषणा की गई है। फेल-पास की पॉलिसी को लेकर कुछ तय नहीं है। एक-दो दिनों में अफसरों के साथ बैठक लेकर शिक्षा के अधिकार कानून का नए सिरे से अध्ययन किया जाएगा। उसके बाद यह तय किया जाएगा कि बच्चों को फेल किया जाएगा या नहीं।
अभी यह हो रहा
पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को फेल नहीं किया जा रहा है। उनका मूल्यांकन कर ए-बी-सी-डी-ई ग्रेड दिया जाता है। बच्चा ई ग्रेड लाता है तो उसे अगली कक्षा के योग्य नहीं माना जाता। उसके बाद शिक्षक की जिम्मेदारी होती है कि वह ई ग्रेड के बच्चे का ग्रेड सुधारकर बाकी बच्चों के समकक्ष खड़ा करे। लेकिन न शिक्षक इस ओर ध्यान दे रहे हैं न बच्चे।
अब यह होगा
इन्हें तिमाही, अर्द्धवार्षिक व वार्षिक परीक्षाएं देनी होंगी। बच्चों को ग्रेड के साथ प्रगति पत्रक दिए जाएंगे, जिनमें अंकों का उल्लेख होगा। इससे बच्चों, शिक्षकों व पालकों, सबको हर टेस्ट के बाद उनका पढ़ाई का स्तर पता चल सकेगा। कार्ड के आधार पर शिक्षकों को फेल स्तर (ई-ग्रेड) के बच्चों को हर हाल में अगली कक्षा में जाने योग्य बनाना होगा। शिक्षकों को समय पर कोर्स पूरा कराना होगा।
फेल न करना हो तो छात्रों को न बताएं: दुबे
यदि कानून में फेल न करने का प्रावधान है तो कुछ नहीं किया जा सकता। लेकिन यह बात छात्रों को न बताई जाए। जब उन्हें यह पता होगा कि दौड़ में भाग लेने वाला भी जीतेगा और न लेने वाला भी, तो तैयारी कौन करेगा? परीक्षा का महत्व खत्म हो जाने से शिक्षा का कबाड़ा ही होगा। ''
एबी दुबे, पूर्व शिक्षा संचालक
शिक्षक, विद्यार्थी दोनों हो गए थे लापरवाह: मंत्री
परीक्षाएं नहीं लेने और सबको पास कर दिए जाने से पढ़ाई के पति बच्चे और शिक्षक, दोनों लापरवाह हो गए थे। शिक्षा का स्तर भी गिरता जा रहा था। इस वजह से अब सतत मूल्यांकन के साथ पहले की तरह लिखित परीक्षाएं भी लेंगे। हालांकि फेल तो अब भी बच्चों को नहीं किया जाएगा। ''केदार कश्यप, शिक्षा मंत्री
एनजीओ असर की 2013 की रिपोर्ट
कक्षा पहली के 50 फीसदी बच्चे अक्षर नहीं पढ़ पाते, जबकि 43 फीसदी बच्चे 1 से 9 तक के अंक नहीं पहचानते।
पांचवीं के 50 फीसदी बच्चे ही दूसरी कक्षा के पाठ पढ़ पाते हैं।
स्कूलों में शिक्षक भी गायब रहते हैं। 83 फीसदी शिक्षक ही स्कूल में दिखे।
प्राइमरी में 97.7% बच्चे एडमिशन लेते हैं। इनमें 24% स्कूल नहीं जाते।