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पीएफ के पैसे पर काटा इंकम टैक्स और डूब गए लाखों रुपए

9 वर्ष पहले
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रायपुर। पीएफ एकाउंट पर इंकम टैक्स नहीं लगता लेकिन पं. रविशंकर शुक्ल यूनिवर्सिटी के शिक्षकों के पीएफ एकाउंट से बैंक ने इंकम टैक्स काट लिया है। खाते में न्यूनतम राशि नहीं रखने की वजह से अन्य शुल्क भी काटा गया है।
दरअसल जिस एकाउंट को विवि कर्मचारियों व प्राध्यापकों का पीएफ एकाउंट बताता है वह बैंक की नजर में सेविंग एकाउंट है। भविष्य निधि के इन पैसों के साथ विवि की गलत व्यवस्था की वजह से कर्मचारियों व प्राध्यापकों के लाखों रुपए डूब गए हैं।
विगत दिनों सूचना के अधिकार के तहत विवि के कुछ प्राध्यापकों ने जब इस एकाउंट की जानकारी ली तो इंकम टैक्स और न्यूनतम राशि नहीं होने के कारण पैसे काटने की बात सामने आई।
इस संबंध में प्राध्यापकों का कहना है कि पीएफ एकाउंट के संबंध में कभी भी पूरी जानकारी नहीं मिली। इस वजह से यह पता ही नहीं चल पाया कि इस पर कितना सूद मिल रहा है।
गौरतलब है कि यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों, अधिकारियों और टीचिंग स्टाफ के वेतन से हर महीने 12 फीसदी राशि भविष्य निधि के अंशदान के रूप में काटी जाती है। इसका प्रबंधन कंट्रीब्यूटरी प्रॉविडेंट फंड (सीपीएफ) के स्वरूप में किया जाता है।
यूनिवर्सिटी के एक्ट के अनुसार भविष्य निधि की इस राशि पर राज्य या केंद्र शासन के कर्मचारियों के समान ब्याज मिलना चाहिए। इसके अनुसार उन्हें करीब साढ़े आठ फीसदी ब्याज मिलना चाहिए था। लेकिन उन्हें सिर्फ ४ फीसदी ब्याज मिल रहा है।
1976 से हैं बैंक में एकाउंट
यूनिवर्सिटी कैंपस में सन 1976 में स्टेट बैंक की एक शाखा खुली। इसी में यहां के कर्मचारियों का एकाउंट है। शुरुआत से ही कर्मचारियों व रजिस्ट्रार के नाम पर एक एकाउंट बैंक में खुलवाया गया। इस एकाउंट को आज भी बैंक सेविंग एकाउंट के रूप में ट्रीट करता है। बताया जा रहा है कि वर्तमान समय में करीब 120 शिक्षक व 350 से ज्यादा कर्मचारी हैं।
यह कहा बैंक ने
शाखा प्रबंधक विशालाक्षी सिरीगिरी ने बताया कि इस बैंक में पीएफ के नाम से कोई एकाउंट नहीं खुलता। कर्मचारी व रजिस्ट्रार के नाम से एकाउंट खुला है। इसमें उनकी भविष्य निधि का पैसा जमा होता है। यह एकाउंट सेविंग है। इसे सेविंग की तरह ही ट्रीट किया जाता है। रजिस्ट्रार के निर्देश पर ही इस एकाउंट से पैसा निकलता है।
यह होना चाहिए था
जानकारों के मुताबिक यूनिवर्सिटी में भविष्य निधि की राशि पर एक्ट के अनुसार सूद मिले इसके लिए विवि को एकाउंट की कमान खुद लेनी थी। हर कर्मचारी या प्राध्यापक का रजिस्ट्रार के नाम से ज्वाइंट एकाउंट खोलने की बजाए सिर्फ रजिस्ट्रार के नाम से सिंगल एकाउंट होना चाहिए था। इस तरह का एकाउंट होने पर एक जगह पैसे रखकर इसका सूद लेकर कर्मचारियों को दिया जा सकता था। लेकिन इसके लिए सभी कर्मचारियों का एकाउंट रखना पड़ता। इस झंझट से बचने के लिए ही विवि ने सारा काम बैंक के भरोसे छोड़ दिया।