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ताकतवर हो गया मलेरिया का मच्छर, उसके दुश्मन पर छाया संकट

9 वर्ष पहले
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भिलाई। क्या बचपन में आपके स्कूल के पीछे या खेल मैदान के किनारे झाड़ियों के आसपास उड़ने वाला एक कीट आपको याद है? छोटा-सा मटमैला पीले रंग का, पतली काली धारी वाला जो जेट विमान की तरह तेजी से उड़ते हुए अचानक हेली काप्टर की हवा में खड़ा हो जाता था और आप उसकी इस कलाबाजी को देखते रह जाते थे।जी हां, आपने बिल्कुल ठीक समझा, हम फुरफूंदी की बात कर रहे हैं जिसे विज्ञान की भाषा में डेंस्पी फ्लाई कहते हैं। यह हमारा मित्र है। लेकिन इस मित्र पर आज संकट आ गया है। पहले की तुलना में इसकी संख्या घटकर दस प्रतिशत भी नहीं रह गई है। बायो डायवर्सिटी यानि जैव विविधता का अध्ययन करने वाले प्रोफेसर बताते हैं कि भिलाई-दुर्ग सहित पूरे छत्तीसगढ़ में इस मित्र कीट की संख्या काफी घट गई है।शहरों में तो यह लगभग लुप्त हो चुका है।जबकि पहले जिधर देखो यही नजर आता था।यदि इन्हें बचाने के प्रयास नहीं किए गए तो जल्द ही इसकी प्रजाति खत्म हो जाएगी।प्रोफेसर्स इसके लिए मनुष्य को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। दुश्मन कीटों को भगाता है और लार्वा को खा जाता है। हमारा यह मित्र मलेरिया रोग पैदा करने वाले मच्छर मादा एनाफिलिस के लार्वा को खा जाता है।इतना ही नहीं यह फसल को चौपट करने वाले कई तरह के दुश्मन कीटों को या तो मार डालता है या इसे देखकर वे भाग जाते हैं। क्लाइमेट चेंज के कारण खतरा विज्ञानी मानते हैं कि क्लाइमेट चेंज होने के कारण ही ड्रेगन फ्लाई और डेंस्पी फ्लाई की संख्या घटी है।क्लाइमेट चेंज के लिए भी मनुष्य ही जिम्मेदार है।उसके द्वारा निर्मित परिस्थितियों की वजह से ही क्लाइमेट चेंज हो रही है। फुरफूंदी की कई प्रजाति इसकी कई उप प्रजातियां हैं।कोई लाल रंग का होता है, कोई हरे रंग का, कोई भूरे रंग का भी होता है। इसकी एक प्रमुख प्रजाति है ड्रेगन फ्लाई।यह आकार में कुछ बड़ा और अक्सर लाल रंग का होता है। बचाने के प्रयास सेंट्रल बायो डायवर्सिटी बोर्ड आफ इंडिया, पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा फुरफूंदी को बचाने के प्रयास किए जा रहे हैं। बोर्ड ने जगदलपुर के कांगेर वेली नेशनल पार्क में ऐसे ही कीटों को बचाने अलग से इंसेक्ट पार्क बनाया है जिसका संचालन राज्य शासन का वन विभाग कर रहा है। आगे आए शिक्षा जगत जैव विविधता किसी भी पारिस्थितिकीय तंत्र की सफलता का परिचायक है। खेद है कि इसमें कमी आ रही है, डेंस्पी फ्लाई या ड्रेगन फ्लाई का मामला इसी से जुड़ा हुआ है।जैव विविधता पर ही मनुष्य का सर्वाइवल निर्भर करता है। इसके संरक्षण के लिए शिक्षा जगत को आगे आना चाहिए। प्रोफेसर डा. अनिल श्रीवास्तव, साइंस कालेज दुर्ग

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