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बस्ता घोटाले में अफसरों पर शिकंजा, ठेकेदार को बख्शा

9 वर्ष पहले
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रायपुर। सरगुजा जिले के चर्चित 5 करोड़ 60 लाख रुपए के बस्ता घोटाले में कलेक्टर - अपर कलेक्टर समेत आधा दर्जन आला अफसरों के खिलाफ जांच तय कर दी गई, लेकिन कृष्णा इंडस्ट्रीज के संचालक व ठेकेदार के विरुद्ध कार्रवाई न करने पर ट्राइबल विभाग पर उंगलियां उठ रही हैं। उधर, आदिवासी बच्चों के लिए बनाया यह पायलट प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार में डूब गया। इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए यूरोपीयन कमीशन ने मदद से हाथ खींच लिए। कमीशन ने नए वित्तीय वर्ष में योजना के लिए फंड नहीं दिया। पिछले साल बस्ते बांटे गए, लेकिन मोजे व जूते नहीं। इस तरह अफसरों ने ठेकेदार के साथ मिलकर आधी राशि पहले ही डकार ली। जिले में ट्राइबल विभाग में 13 साल की उम्र के छात्र हैं 1.82 लाख, लेकिन बस्तों का दोगुना आर्डर दिया। अर्नेस्ट मनी में 28 लाख रुपए की छूट लेकर कृष्णा इंडस्ट्री ने सरकार के साथ धोखाधड़ी की। कांग्रेस ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। सरगुजा विधायक व कांग्रेस उपाध्यक्ष टीएस सिंहदेव ने मांग की कि भाजपा से जुड़े ठेकेदार के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज कराया जाए। उसके विरुद्ध शासन के पास प्राथमिकी दर्ज करवाने पर्याप्त सबूत हैं। फिर भी उसे बचाया जा रहा है। जब कलेक्टर, अपर कलेक्टर, सहायक आयुक्त सहित छह आला अफसरों पर कार्रवाई हो सकती है तो ठेकेदार पर क्यों नहीं? कागजों में फैक्ट्री दिखाने वाले इस ठेकेदार ने दिल्ली से घटिया बसते मंगवाकर सप्लाई किए। आदिवासी बच्चों के हित योजना में भ्रष्टाचार से राज्य की छवि धूमिल हुई है। पायलट प्रोजेक्ट के लिए यूरोपीयन कमीशन से फंड न मिलना इसे साबित करता है। आदिम जाति कल्याण विभाग ने छह से 13 साल के जिन बच्चों को बस्ता बांटने के लिए बस्ते बनवाने मार्च 2011 को ई-टेंडर आमंत्रित किए थे। मनेंद्रगढ़, रायपुर, अंबिकापुर, दिल्ली गुड़गांव, गाजियाबाद की 13 कंपनियों ने टेंडर भरे। इनमें से छह कंपनियों के नमूने टेक्निकली रिजेक्ट कर दिए गए। बाकी चार कंपनियों ने डीडी बनवाकर 28-28 लाख रुपए अर्नेस्ट जमा की। दो कंपनियों ने स्वयं को स्थानीय बताकर जिला लघु उद्योग केंद्र से अर्नेस्ट मनी के लिए छूट प्राप्त करने प्रमाण पत्र संलग्न किए। इनमें ठेका पाने वाली कृष्णा इंडस्ट्री भी शामिल है। दिलचस्प यह कि इन कंपनियों के संचालकों ने क्रमश: 7 व 10 मार्च को कंपनी के रजिस्ट्रेशन का प्रमाणपत्र संलग्न किया। ज्ञात हो कि टेंडर 15 मार्च को हुआ। यानी संबंधित कंपनी को अनुभव नहीं था। सूत्रों के अनुसार कंपनी अब तक गद्दे-मच्छरदानी ही बनाती रही। जबकि बस्ते बनाने टेंडर की तीन प्रमुख शर्तें थीं - तकनीकी अनुभव, वित्तीय स्थिति और कार्यानुभव। संबंधित कंपनी ने 36 हजार बस्ते प्रति वर्ष क्षमता बताई। 2007-08 में उसने 15 लाख और 2008-09 में 7.50 लाख रुपए का टर्न ओवर बताया। भंडार क्रय नियम के अनुसार एसएसआई की छूट केवल उसे ही दी जा सकती है जो लोकल हो और अपनी फैक्ट्री में माल बनाता हो। यहां जब आर्डर दिल्ली से सप्लाई होने की बात सामने आई तो जिला व्यापार व उद्योग केंद्र (डीआईसी) में शिकायत की गई। डीआईसी ने पुनर्परीक्षण की रिपोर्ट में फैक्ट्री को बंद होना बताया। बताया गया कि कंपनी का बोर्ड तक संबंधित पते पर नहीं था। वहां कोई और कंपनी का बोर्ड लगा था। इसके बावजूद आदिम जाति कल्याण विभाग ने दो माह बाद संबंधित कंपनी से 28 लाख अर्नेस्टमनी लेकर मुसीबत मोल ले ली। शर्तो के मुताबिक कंपनी न तो स्वयं बस्ते का निर्माता है और न ही किसी निर्माता कंपनी की अधिकृत विक्रेता है। सहायक विकास आयुक्त कार्यालय ने नियमों के विरुद्ध अन्य कंपनियों को बिना आवेदन के उनकी जमा 28-28 लाख रुपए अर्नेस्ट मनी लौटा दी।

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