नवापारा राजिम/ रायपुर। ना हठ, ना योग और ना मनोरथ सिर्फ परमपिता की शक्ति से इसी तरह पिछले 5 वर्षों से आठों पहर चौबीसों घंटे पैरों पर खड़ा हूं। परमात्मा की इच्छा है तभी मुझे यह साधना की शक्ति प्राप्त है, यदि उद्देश्य के साथ यह क्रिया करता तो शायद असफल रहता, अब तक पूर्ण मनोयोग से यह साधना जारी है। यह कहना है बरेली मूल निवासी ब्रहृाचारी अशोक गिरी संन्यासी 35 वर्ष का। कुंभ में वे पिछले 3 दिन से खड़े-खड़े ही सारी क्रियाएं कर रहे हैं। सोते भी हैं तो खड़े होकर एक झूले के सहारे। 11 साल तक खड़े रहने का उन्होंने संकल्प लिया है। संन्यासी ने बताया कि तीन बार पैरों की खाल बदल चुकी है।
सबसे पहले 41-41 दिनों का तीन बार इसी तरह खड़े रहकर अपने को इस क्रिया के लिए अभ्यस्त किया। अब 5 वर्षों में तो इसकी आदत पड़ गई है। श्री अशोक गिरी के अनुसार बचपन से ही दिमाग में वैराग्य ऐसा समाया कि उस कच्ची उम्र में ही घर-व्दार छोड़ इस राह पर चल पड़ा। लंबे समय से श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा बड़ा हनुमान काशी से जुड़े अशोक गिरी ने बताया कि अपनी सभी दैनिक क्रियाओं सहित रात्रि विश्राम से लेकर नियमित भोजन एवं अन्य क्रियाकलाप इसी तरह खड़े-खड़े पूरी करते हैं। रात्रि विश्राम के लिए अपने सामने डले एक झूले का सहारा ही उन्हें काफी है।
सफर के दौरान ट्रेन, बस में तो सीधे खड़े होते बन जाता है अलबत्ता छोटे लोकवाहक जैसे ऑटो आदि में कमर से झुककर सफर तय करना पड़ता है। लगातार खड़े रहने की क्रिया के दौरान एक-एक पैर को आराम देने के उद्देश्य से उसे मोड़कर दूसरे पैर के घुटने के सहारे एक ही पैर से इस क्रिया को आगे बढ़ाते हैं।
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