रायपुर। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की एकतरफा जीत का असर छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी पड़ने के आसार हैं। पिछली बार जब दिल्ली और छत्तीसगढ़ के एक-साथ चुनाव हुए थे और दिल्ली में 49 दिन तक अरविंद
केजरीवाल मुख्यमंत्री बने थे, तब दिल्ली जैसी योजनाएं और निर्णय प्रदेश में भी हुए थे। माना जा रहा है कि भाजपा सरकार भ्रष्टाचार और जनता की समस्याओं पर फोकस करेगी। पिछली बार दिल्ली में समस्याओं के निराकरण के लिए टोल-फ्री नंबर जारी किया गया था तो छत्तीसगढ़ में भी टोल-फ्री नंबर जारी किया गया था।
हालांकि यह नंबर केवल नगरीय निकायों की समस्याओं के लिए था। इसी तरह मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जीरो टालरेंस का नारा दिया था। सरकार पर चुनावी वादे पूरा करने का भी दबाव था। दूसरी ओर इस नतीजों पर कांग्रेस के महामंत्री शैलेष नितिन त्रिवेदी ने कहा कि दलबदल और सांप्रदायिकता की राजनीति को के मतदाताओं ने नकार दिया है।
बेदी को हराने प्रचार किया था छग के लोगों ने
दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए छत्तीसगढ़ से भी 100 कार्यकर्ता गए थे। आप के प्रदेश संयोजक डॉ. संकेत ठाकुर ने बताया कि उनकी टीम ने
किरण बेदी के क्षेत्र में प्रचार किया था। वहां वकील एके बग्गा को जीत मिली। इधर आप के कार्यकर्ताओं ने जयस्तंभ चौक पर जीत का जश्न मनाया। आप के प्रवक्ता नागेश बंछोर ने कहा कि दिल्ली में जीत का असर छत्तीसगढ़ की राजनीति पर भी पड़ेगा। पार्टी अपना विस्तार यहां करेगी। इस मौके पर उचित शर्मा, संदीप तिवारी, मनोज बिसेन समेत कार्यकर्ता मौजूद थे।
कसक थी, अब बोले, अच्छा हुआ दिल्ली नहीं बुलाया
जब तक दिल्ली में चुनाव के नतीजे नहीं आए थे भाजपाइयों को एक बात की कसक थी कि
अमित शाह ने उन्हें चुनाव प्रचार के लिए दिल्ली क्यों नहीं बुलाया। क्या वे इस लायक भी नहीं हैं कि दो-तीन सीटों की जिम्मेदारी मिलती जहां छत्तीसगढ़ के लोग हैं। चुनाव परिणाम आते ही वे काफी खुश हैं, कि चलो अच्छा हुआ जो नहीं गए। चुनाव मैनेजमेंट के दिग्गज माने जाने वाले नेता अब काफी राहत महसूस कर रहे हैं। पार्टी हलकों में दिनभर यही चर्चा का बिंदु रहा। कम से कम हार का कलंक लगने से बच गया। जहां चाणक्य कहे जाने वाले धराशायी हो गए तो इनकी क्या चलती। पार्टी नेताओं का मानना है कि अब केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों पर विरोध के स्वर मुखर होने लगेंगे। पहले शत्रुघ्न सिन्हा, फिर सांसद कीर्ति आजाद और एमपी के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बयान इसके उदाहरण हैं।