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45 दिन की कठिन ट्रेनिंग, आग में तप कर तैयार होते हैं ये गुरिल्ला कमांडोज

6 वर्ष पहले
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कांकेर / रायपुर। ये गुरिल्ला कमांडो हैं। छत्तीसगढ़ के जंगलों में इनकी दहाड़ गूंजती है- ‘फाइट द गुरिल्ला, लाइक ए गुरिल्ला’। आग को रौंदते कदम नक्सलियों के गढ़ में बढ़ते हैं तो जंगल भी कांप उठता है। तस्वीर कांकेर के जंगल वॉरफेयर कैंप की है। शहर से 7 किमी दूर। यहां महिला पुलिस अफसरों को नक्सलियों से लड़ने की ट्रेनिंग दी जा रही है। उफनती नदियों और आग से गुजरना, बिना सहारे पहाड़ पर चढ़ना इनकी ट्रेनिंग का हिस्सा है।
एक नजर
- 42 महिलाएं ले रही हैं अभी ट्रेनिंग
- 193 महिलाएं ले चुकी हैं ट्रेनिंग
- 12 राज्यों के जवान हो चुके यहां से प्रशिक्षित
45 दिन की कठिन ट्रेनिंग
- रोजाना 5 किमी और सप्ताह में एक दिन 30 किमी की दौड़। हफ्ते में एक दिन भारी बोझ के साथ 20 किमी की दौड़।
- भारी गोलीबारी के बीच खुद को बचाते हुए दुश्मन पर वार करना।
- महीने में कम से कम 5 दिन और 5 रात घने जंगलों में गुजारना। जरूरत पड़ने पर सांपों को भी खा जाना।
एक आम लड़की से कमांडो बनने का सफर
कांकेर शहर से 7 किलोमीटर दूर जंगल के बीच जंगलवॉर फेयर कॉलेज में मर्दानी आवाज में हर रोज कई दफे नारा गूंज रहा है-फाइट द गुरिल्ला-लाइक अ गुरिल्ला। पुलिस की सामान्य ट्रेनिंग के बाद एक लड़की कांकेर के जंगलवॉर फेयर कॉलेज में प्रवेश करती है इस नारे के साथ। लगातार 45 दिनों की कड़ी ट्रेनिंग के बाद जब कॉलेज से बाहर निकलती है तब वह हो जाती है जंगलवार में दक्ष कमांडो। जी हां। नक्सलियों के गढ़ में रहकर नक्सलियों से निपटने का माद्दा सिखाता है यह कॉलेज।
कांकेर से 7 किलोमीटर जंगल में वह सब कुछ सिखाया जाता है जो जंगल के भीतर गुरिल्ला वॉर की जरूरत है। नक्सलियों के खिलाफ किस तरह मोर्चा संभालना है। विषम परिस्थितियों में किस तरह अपने आपको बचाए रखना है, सब कुछ। गोलीबारी। निहत्थे दुश्मनों से लोहा लेना। जंगल में खतरनाक सांपों को काबू करना। पहाड़ की सीधे चढ़ाई करनी हो।
ऊंचाई से व आग के उपर से सुरक्षित कूदना हो। जंगलवॉर कॉलेज में इस समय 42 महिलाओं को ट्रेंड किया जा रहा है। इनमें 40 एसआई और 2 सूबेदार हैं। इस कॉलेज में 2007 से महिला पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। अब तक 193 महिलाएं यहां ट्रेंड होकर निकल चुकी हैं। इनमें 22 डीएसपी, 14 एसआई 130 कांस्टेबल और 27 एसएसपीओ रेंक की हैं।
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