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16 गांव करते हैं इस देवी की पूजा, महिलाओं को छूने तक नहीं दिया जाता प्रसाद

6 वर्ष पहले
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दंतेवाड़ा / रायपुर। गांव बालूद में जंगल में विराजी घाट बंजारिन देवी के दर्शन महिलाएं नहीं कर सकती। इतना ही नहीं महिलाओं के लिए यहां का प्रसाद लेना भी वर्जित है। यहां तीन साल में एक आयोजित किए जाने वाले जात्रा(मेला) स्थल पर महिलाओं के प्रवेश पर भी पूरी तरह से मनाही है। चढ़ावे में आई चीजों को प्रसाद के तौर पर ग्रहण करने के लिए ग्रामीण मौके पर ही अपनी रसोई तैयार करते हैं, और भोजन के बाद फिर से देवी स्थल पर जुटते हैं।
आयोजन में सिर्फ देवी दंतेश्वरी को राजदेवी और बालंपेट की गंगनादेई माता को पल्ली देवी की हैसियत से आमंत्रित किया जाता है। नजदीक ही अलग-अलग पेड़ के नीचे माड़काराज देव और द्वारपाल को भी चढ़ावे से सम्मानित करते हैं। जात्रा में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक बाजा मोहरी वाद्य को महुए की शराब का तर्पण दिया जाता है। यहां चढ़ाया जाने वाला प्रसाद भी लोग घर नहीं ले जा सकते।
16 गांव से जुटते हैं ग्रामीण
घाट बंजारिन देवी के स्थल पर जात्रा का आयोजन 16 गांव के ग्रामीण करते हैं। बगैर किसी प्रशासनिक मदद के ग्रामीण अपने चंदे से पैसे और अनाज इकट्‌ठा करते हैं। इन गांवांे में दंतेवाड़ा, फूलपदर,पंडेवार, हाऊरनार, गुमडा, बालपेट, बालूद, चितालूर, भैरमबंद, गीदम ब्लाॅक के फरसपाल, आलनार, कुआकोंडा ब्लॉक के पालनार पेंटा, सुकमा जिले के झलियारास, तालनार, बीजापुर जिले के मिंगाचल, केतुलनार शामिल हैं।
इसलिए महिलाएं वर्जित
बालपेट निवासी भंडारी परिवार के लक्ष्मीनाथ का परिवार पीढ़ियों से देवी के पुजारी के तौर पर सेवा दे रहा है। जात्रा में पहुंचे अमर सिंह के मुताबिक उनके बुजुर्ग बताते हैं कि पूर्व में देवी का वास बालूद के कड़ाई तरई के नजदीक था। देवी का भोग प्रसाद पकाने में इस्तेमाल होने वाली लोहे की विशाल कढ़ाही अब भी तालाब के किनारे मौजूद है। किसी कारणवश महिलाओं से अपवित्र होने के चलते देवी ने अपना स्थान बदलकर बालूद के ही नाला किनारे स्थित सियाड़ी तने के नीचे अपना वास बना लिया। तब से महिलाओं व बच्चियों का प्रवेश इस जगह पर वर्जित है।
नाले का पानी पी रहे ग्रामीण
इतना बड़ा आयोजन होने के बावजूद प्रशासन या वन विभाग की ओर से कोई इंतजाम नहीं किए जाते हैं। हैंडपंप नहीं होने के चलते ग्रामीण नजदीक बहने वाले बरसाती नाले के ठहरे हुए पानी का इस्तेमाल पीने और खाना पकाने में करते हैं। छोटे-झाड़ –बड़े झाड़ का जंगल होने की वजह से ग्राम पंचायत भी यहां बाउंड्रीवॉल और पहुंच मार्ग का निर्माण नहीं हो पा रहा है।
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