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धान बेचने से पहले ही जद्दोजहद कर रहे किसान

7 वर्ष पहले
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रायगढ़। जिले में समर्थन मूल्य पर की जाने वाली धान खरीदी की तैयारी शुरू कर दी गई है। इसके लिए किसानों का पंजीयन शुरू किया गया है लेकिन कुछ बातें किसानों को जहां परेशान कर रही हैं वहीं समितियों के लिए सिरदर्द साबित हो रही हैं। शासन के निर्देश स्पष्ट नहीं होने के कारण उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं ने उच्चाधिकारियों से मार्गदर्शन मांगा है।
जिले के कुछ विकासखंडों में पंजीयन के दौरान किसानों की परेशानी की बात सामने आई। घरघोड़ा ब्लाक में तमनार तराईमाल समेत कई जगहों से मिली जानकारी के मुताबिक भू राजस्व रिकार्ड के मुताबिक जिस किसान के खाते में एक से ज्यादा नाम हैं उन्हें धान खरीदी के बाद संयुक्त बैंक खाते का ही चेक दिया जाएगा। सहकारिता विभाग का तर्क है कि बड़े भूखंड में एक से ज्यादा खातेदार होते हैं तो कई लोग अपने हिस्से की जमीन के आधार पर ऋण लेते हैं।

धान की बिक्री के बाद अगर अलग-अलग नामों से चेक दिया जाएगा तो किसान को अपने कर्ज की वापसी में आसानी होगी। इसके दूसरी तरफ किसानों का कहना है कि कई मामलों में सह खातेदार दूसरे शहरों या गांवों में निवास करते हैं ऐसे में संयुक्त बैंक खाते का चेक मिलने से व्यवहारिक दिक्कतें आएंगी। इसके साथ ही अपना पंजीयन कराने पहुंच रहे किसानों से मोबाइल नंबर पूछा जा रहा है। कुछ किसानों के पास मोबाइल नहीं होने के कारण उन्हें परेशानी हो रही है। जिस किसान ने हाल में जमीन खरीदी हो और वह पंजीयन कराने पहुंच रहा है तो उससे धान की बिक्री का पुराना रिकार्ड पूछा जा रहा है। पुराने किसानों से भी पांच सालों की धान खरीदी का रिकार्ड मांगा जा रहा है। समितियों के पास भी दो सालों से ज्यादा का रिकार्ड नहीं हैं। ऐसे में पंजीयन में परेशानी हो सकती है। हालांकि किसी प्रकार की आपत्ति पर तहसीलदार के पास 1 अक्टूबर के बाद जा कर पंजीयन कराया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि समर्थन मूल्य पर धान खरीदी में बड़े पैमाने पर दूसरे राज्यों का धान जिले की सहकारी समितियों में बेचा जाता है। बरमकेला, सारंगढ़, लैलूंगा ब्लाक में बड़ी मात्रा में धान की बोगस खरीदी होती है। इसे रोकने के लिए शासन ने धान खरीदी से पहले पंजीयन की प्रक्रिया को थोड़ा जटिल बनाया है ताकि धान खरीदी में गड़बड़ी को रोका जा सके।

^पंजीयन तकनीक से किसानों के सामने कुछ व्यवहारिक दिक्कतें रही हैं जिसकी जानकारी उच्चाधिकारियों शासन को दी गई है। धान का पुराना रिकार्ड तो किसानों के पास आमतौर पर होता ही है, इससे ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। बसंत कुमार,डीआरसीएस सहकारिता विभाग।