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जैसे-जैसे बीत रहा है वक्त, 'बढ़ता जा रहा है इस जख्म का दर्द'

9 वर्ष पहले
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गुड़गांव. हुडा द्वारा खुले छोड़े गए सीवर में गिरने से दो साल पहले अपने चार वर्षीय बेटे संदीप को खो चुके चंचल सैनी आज तक सदमे से बाहर नहीं आ पाए। बेटे की याद आते ही पूरे परिवार की आंखें नम हो जाती हैं।



बार-बार बोरवेल, सीवर और गड्ढों में बच्चों के गिरने की घटनाओं की खबर जब इन तक पहुंचती है, तो अनायास ही मासूम बेटे की सूरत आंखों के सामने उभर आती है। इन्हें दर्द इस बात का है कि आखिर ऐसी घटनाओं के बाद भी प्रशासन क्यों नहीं चेत रहा।



14 जुलाई 2010 दिन बुधवार। अपनी मां पूनम की अंगुलियां थामे चार वर्षीय संदीप रोज की तरह सड़क पर अटखेलियां करते घर से चला था। स्कूल के रास्ते में अचानक उसने सीवर के मैनहोल पर छलांग लगाई। मां का हाथ छूटा और मौत के क्रूर पंजे ने उसे 20 फीट नीचे मैनहोल में खींच लिया। एक किमी दूर नाले में बेहोशी की हालत में उसे तलाश लिया गया, लेकिन उपचार के दौरान चार दिन बाद अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया।



हुडा के जिम्मेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। बेटे की याद में बिलखती पूनम को हुडा ने चंद नोटों की गड्डियां पकड़ाईं और केस बंद हो गया। मैनहोल आज भी खुले हैं, प्रशासन आज भी अपनी ही गति से चल रहा है। नहीं है तो संदीप। शेष हैं सिर्फ उसकी स्मृतियां। कोई नहीं उठाता आवाज। या तो यह शहर अपनी व्यस्तताओं में मशगूल है या फिर खो रहा है अपनी संवेदनशीलता?



शनिवार दोपहर घर के बाहर बैठे संदीप के पिता चंचल, माता और दादी आज के दिन को परिवार के लिए सबसे अशुभ दिन मानते हैं। कहते हैं कि उनके साथ जो हुआ, सो हुआ। प्रशासन को अब कोई ठोस व सख्त कदम उठाने चाहिए। ताकि किसी का लाल सीवर या बोरवेल में न गिरे।इतना कहते ही चंचल की आंखें भर आईं, शिकायत की कि इस मामले में किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई।हुडा प्रशासन ने साढ़े पांच लाख रुपए दिए, लेकिन सादे कागजों पर हस्ताक्षर भी ले लिए। बेटे की मौत के बाद चंचल को ऐसा सदमा लगा कि आज भी चारपाई से नहीं उठ पाए।



मामला अनट्रेस, फाइल बंद इस मामले में किसी को आरोपी नहीं बनाया गया।हुडा के खिलाफ लापरवाही का मामला तो दर्ज किया गया लेकिन किसी भी अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं की गई, जिससे पुलिस ने इसे 8 अक्टूबर 2011 को अनट्रेस मामला मानकर एक तरह से फाइल ही बंद कर दी।



जब कार्रवाई नहीं तो कैसा केस



खुले बोरवेल व गड्ढों में मासूमों के गिरने के बाद मुकदमा तो दर्ज कर लिया जाता है, लेकिन प्रशासन आगे की कार्रवाई करना भूल जाता है। हाल के मामले प्रशासन की लापरवाही की गवाही दे रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जब कार्रवाई नहीं होनी तो फिर मामला दर्ज ही क्यों होता है।



दर्द ऐसा कि...



एक वर्षीय बेटी अनन्या को गोद में लिए पूनम तो अपने दर्द को शब्द भी नहीं दे सकी। संदीप की बात होते ही अधर कंपकंपाने लगे। आंखें शून्य में निहारने लगीं। दादी कमला सैनी कहती हैं पोते की मौत की जिम्मेदार सड़क पर फैली अव्यवस्था है। सिस्टम दुरुस्त होता तो हमारा संदीप आज छह साल का होता और आंगन में चहक रहा होता।



19 जून 2012



कासन गांव की ढाणी में खुले बोरवेल में 4 वर्षीय माही गिर गई। 24 जून को उसे गड्ढे से बाहर निकाला जा सका, लेकिन तब तक उसकी सांसें थम चुकी थीं।



1 जुलाई 2012 गांव चौमा में डेढ़ वर्षीय सचिन घर के पास बिजली विभाग द्वारा खोदे गए गड्ढे में गिर गया। करीब तीन घंटे बाद उसे सकुशल बाहर निकाल लिया गया। पालम विहार थाना पुलिस ने बिजली निगम के एसडीओ, जेई, एक्सईन व ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर तो दर्ज की, लेकिन किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया जा सका है।



5 जुलाई 2012 रात करीब साढ़े 8 बजे गांव काकरौला निवासी 6 वर्षीय सुमित उर्फ गुड्डू आईएमटी मानेसर सेक्टर-6 में खुले सीवर में गिर गया। वह अपनी मां सविता व पिता के साथ घर लौट रहा था। करीब दो घंटे बाद बच्चे को सीवर से निकाला गया, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी।मानेसर थाना पुलिस ने मामले को हादसा करार देते हुए किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की।



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