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डाउनलोड करेंसुपर 30 के संस्थापक आनंद कुमार इस बार पाठकों को बता रहे हैं एक ऐसी छात्रा की कहानी जो कई संघर्षों के बाद आज विदेश में पढ़ रही है। उसने अपने पिता के अलग हो जाने के बाद मां का सहारा बन कर पढ़ाई की और अपनी मेहनत और लगन से आज अमेरिका में रिसर्च स्कॉलर है...
फोन की एक घंटी बजी। आवाज ने आठ बरस पुरानी यादों को ताजा कर दिया। दूसरी तरफ प्रज्ञा वर्मा थी। अमेरिका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कॉलर। इस साल 'सुपर 30' के 28 बच्चे आईआईटी में सिलेक्ट हुए। यह खबर उसने इंटरनेट पर देखी और मुझे कॉल किया। वह दार्जिलिंग, गया और फिर पटना में पढ़ाई के संघर्ष और सपनों से भरे उस दौर को याद कर रही थी। प्रज्ञा सुपर 30 के मेरे सफर की चंद ऐसी यादों का हिस्सा है, जो कभी भुलाई नहीं जा सकतीं।
जिंदगी में ऐसे खतरनाक मोड़ कम ही लोगों के हिस्से में आते हैं। वह 2000 का साल था, जब प्रज्ञा के परिवार में एक भूचाल आया। अचानक प्रज्ञा के पिता ने अपने ही परिवार से नाता तोड़ लिया।
बीवी-बच्चों को जैसे भुला ही दिया। मां ने विरोध किया तो सब सड़क पर आ गए। उसके पहले दो भाइयों के साथ वह दार्जिलिंग के एक नामी स्कूल में पढ़ती थी। घर में समृद्धि का हर सामान था। किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। पिता के इस व्यवहार ने तीन बच्चों सहित एक मां को जीवन के विकट मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। इंसान का असल इम्तहान ऐसे ही कठिन हालात में होता है। प्रज्ञा की दृढ़प्रतिज्ञ मां ने नए सिरे से जिंदगी शुरू करने का फैसला लिया और शहर बदलकर गया आ गईं। सिलाई जानती थीं। अब इसका ही सहारा था।
प्रज्ञा तब तक एक साधारण विद्यार्थी थी। लेकिन हालातों ने उसे भी बदला। मां सिलाई करती। घर चलाती। वह सिर्फ पढ़ती। बचे वक्त में मां का हाथ बटाती। जब दसवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की तो सपनों को पंख लगे। जैसे अब उसे कुछ करके ही दिखाना था। कहीं से उसे सुपर 30 के बारे में पता चला। पटना में एक दिन वह मेरे सामने थी। मैंने देखा कि उस उम्र की दूसरी लड़कियों की तुलना में प्रज्ञा वाकई प्रज्ञावान थी। वह एक सवाल को कई ढंग से हल करने की मेरी शैली की तारीफ करती और खुद भी कोशिश करती। उसने अपनी पूरी ऊर्जा और समय पढ़ाई को दिया।
2006 में एक शुभ समाचार उनकी अंधेरी दुनिया में रोशन दीए की तरह आया। वह आईआईटी में चुन ली गई थी। उसे देश के अव्वल संस्थान आईआईटी-बॉम्बे में दाखिला मिला। फीस के लिए लोन लिया। एक नया आसमान उसके सामने था। वह तो न जाने कब से उड़ान के लिए पंख फैलाए थी। वक्त भी पंख लगाकर उड़ा। प्रज्ञा की डिग्री पूरी हुई और वह सात समंदर पार अमेरिका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में केमिस्ट्री के एक रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए जा पहुंची।
पटना में इस बीच मेरी यात्रा साल-दर-साल नए-नए विद्यार्थियों के बीच जारी रही। पिछले दिनों प्रज्ञा के फोन ने मुझे वे दो साल याद दिला दिए, जब मेरी यात्रा में प्रज्ञा का भी पड़ाव हुआ था। मैं इस नाते कभी खुद पर गर्व नहीं करता कि कितने गरीब और बेबस परिवारों के बच्चे आईआईटी में गए। गर्व इस बात पर जरूर होता है कि इस सफर में मैं देश के ऐसे प्रतिभाशाली रत्नों से मिला, जो जमीन पर मिट्टी में पड़े थे। मैंने उनमें अपार ऊर्जा और अथाह उत्साह पाया। कड़ी मेहनत और लगन तो उनमें थी ही। वे अपने इन्हीं गुणों से आगे बढ़े। साल-दो साल का मेरा साथ तो निमित्त की बात है। मेरी उजली स्मृतियों में प्रज्ञा का नाम एक रोशन दीए की तरह हमेशा जगमगाता है। शाबास प्रज्ञा!
नॉलेज: एकेडमिक्स ही नहीं, सॉफ्ट स्किल्स भी जरूरी
विदेशी इंस्टीट्यूट्स में प्रवेश पाने के लिए सिर्फ एकेडमिक्स मजबूत होना ही जरूरी नहीं है, ध्यान देना होता है पोर्टफोलियो, एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज़ जैसी कुछ खास बातों पर भी। अमेरिका के नेशनल एसोसिएशन फॉर कॉलेज एडमिशन काउंसलिंग ने 2011 की रिपोर्ट में बताए ऐसे ही कुछ क्राइटेरिया के महत्व और दिए स्टूडेंट्स टिप्स ...
एडमिशन टेस्ट स्कोर्स
महत्व: कॉलेज में आपके परफॉरमेंस को आंकेगा।
टिप: कॉलेज के एकेडमिक्स को मजबूत बनाने के लिए सिर्फ किताबी ज्ञान न लें।
कॉलेज ग्रेड्स
महत्व: कॉलेज में आपके परफॉरमेंस को आंकेगा।
टिप: कॉलेज के एकेडमिक्स को मजबूत बनाने के लिए सिर्फ किताबी ज्ञान न लें।
कॉलेज ग्रेड्स
महत्व: अन्य छात्रों के मुकाबले आपकी क्षमता को आंकता है।
टिप: टेस्ट दोबारा दें अगर आपको लगे कि आपका स्कोर दूसरे छात्रों से बेहतर नहीं होगा।
एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज
महत्व: आपकी रुचि के बारे में बताता है।
टिप: लीडरशिप क्वालिटी बताता है। इसलिए दूसरी एक्टिविटीज़ में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लें।
निबंध या लेख
महत्व: अपने विचार लोगों को बताने का मौका देता है।
टिप: दूसरों से अपना निबंध पढऩे को कहें। उससे गलतियां सुधारने में मदद मिलेगी।
टीचर रेकमंडेशन
महत्व: आपकी स्ट्रेंथ के बारे में चर्चा करने का मौका।
टिप: अपनी टीचर से अपने लिए क्वालिटी कवर लेटर भी लिखवाएं।
इंटरव्यू :
महत्व: आपके व्यक्तित्व बारे में जानने का तरीका।
टिप: एक-तरफा इंटरव्यू न होने दें। जवाब भी पूरे दें और सवाल भी पूछें।
इंटरेस्टिंग कोट
“If we knew what it was we were doing, it would not be called research, would it?”- Albert Einstein
अगर हमें पहले से पता होता कि हम क्या कर रहे हैं और उसका परिणाम क्या होगा, तो वह कभी भी रिसर्च नहीं कहलाया जाता।
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