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डेटा एनालिसिस का असर, साइंस ग्रेजुएट की मांग इंजीनियर से ज्यादा

कंपनियां डेटा एनालिसिस के लिए इंजीनियरों की बजाय साइंस ग्रेजुएट को नियुक्त करने को वरीयता दे रही हैं।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Apr 21, 2016, 10:59 AM IST

  • एजुकेशन डेस्क। कंपनियां डेटा एनालिसिस के लिए इंजीनियरों की बजाय साइंस ग्रेजुएट को नियुक्त करने को वरीयता दे रही हैं। एंट्री लेवल पदों पर उन्हें पैकेज भी डेढ़ से दो गुना तक ज्यादा मिल रहा है। वहीं सीनियर पदों पर इकोनॉमिक्स या स्टैटिस्टिक्स के छात्रों को ज्यादा अहमियत मिल रही है।
    पहले जरूरी थी इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट की डिग्री :
    डेटा एनालिसिस और बिग डेटा जैसे-जैसे बड़ी कंपनियों की जरूरत बन रहा है, इस फील्ड में नौकरी के अवसर भी बढ़ रहे हैं। दो-तीन साल पहले तक इन नौकरियों के लिए इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट या चार्टर्ड अकाउंटेंसी जैसी डिग्रियां जरूरी मानी जाती थीं, लेकिन अब कंपनियां साइंस ग्रेजुएट्स को नियुक्त करना ज्यादा पसंद कर रही हैं। फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स, स्टैटिस्टिक्स या इकोनॉमिक्स में डिग्री लेने वाले छात्रों को आंकड़े जमा करने और उनके विश्लेषण की बेहतर क्षमता के लिए ज्यादा मौके मिल रहे हैं।
    पैकेज भी डेढ़ से दो गुना ज्यादा :
    एक नए सर्वे के अनुसार साइंस ग्रेजुएट्स को कंपनियां एंट्री लेवल पर 4 से 7 लाख रुपए सालाना तक का पैकेज दे रही हैं। 4-5 साल का अनुभव हासिल कर चुके प्रोफेशनल्स 12 से 15 लाख रु. सालाना तक की कमाई कर रहे हैं। वहीं एनालिटिक्स सेक्टर में इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त छात्रों का शुरुआती औसत पैकेज 3 लाख 50 हजार रु. है। यानी इंजीनियरों के मुकाबले साइंस ग्रेजुएट का पैकेज डेढ़ से दो गुना तक ज्यादा है और उनके लिए कॅरिअर ग्रोथ के लिए भी पर्याप्त अवसर हैं।
    ऑफ कैंपस नियुक्ति, सीनियर पदों के लिए इकोनॉमिक्स, स्टैटिस्टिक्स को वरीयता :
    नैसकॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार बीपीओ को छोड़कर इस सेक्टर में 5 से 6 फीसदी स्टाफ ही फिलहाल नॉन-इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से है, लेकिन यह अनुपात तेजी से बढ़ रहा है। टाटा कंसल्टेंसी और विप्रो जैसी बड़ी कंपनियों ने तो साइंस ग्रेजुएट्स को नियुक्त करने की विशेष नीति बना ली है। एक्सपर्ट बताते हैं कि अधिकतर कंपनियां एंट्री लेवल के पदों के लिए साइंस और मिडिल-लेवल के लिए इकोनॉमिक्स या स्टैटिस्टिक्स के छात्रों को वरीयता देती हैं। इनकी नियुक्ति की प्रक्रिया भी इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स से अलग है। अधिकांश नियुक्तियां ऑफ कैंपस होती हैं।
    आगे की स्लाइड पर जानिए हायरिंग में पीछे हैं इंजीनियर...
  • स्किल आधारित हायरिंग में पीछे हैं इंजीनियर :
    नैसकॉम की रिपोर्ट में बताया गया है कि कंपनियां नियुक्ति के लिए स्किल को ज्यादा महत्व दे रही हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर मैनेजमेंट जैसे कामों के लिए भी साइंस ग्रेजुएट को वरीयता मिल रही है, क्योंकि इसमें इंजीनियरिंग सब्जेक्ट्स की ज्यादा जरूरत नहीं होती। दूसरा कारण यह भी है कि ऐसे कामों के लिए साइंस ग्रेजुएट डेढ़ से दो लाख रुपए सालाना के पैकेज पर मिल जाते हैं, लेकिन इंजीनियरों की नियुक्ति करने पर उन्हें औसतन तीन लाख रु. का पैकेज देना होता है। इसके अलावा साइंस ग्रेजुएट की ऑन द जॉब ट्रेनिंग आसान होती है और वे काम की जगह या घंटों की भी ज्यादा शिकायत नहीं करते।
    एक साल में एक लाख से ज्यादा नौकरियां मिलने की संभावना :
    आईडीसी के अनुसार वर्ष 2018 तक बिग डेटा और एनालिटिक्स का वैश्विक बाजार 41.5 अरब डॉलर का हो जाएगा। इसके विस्तार की दर सालाना 26.4 फीसदी रहने का अनुमान है जो इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के मुकाबले करीब छह गुना ज्यादा है। वहीं, भारतीय कंपनियां वर्ष 2011 तक डेटा एनालिसिस पर कुल 4 अरब डॉलर खर्च कर रही थीं। 2020 तक यह आंकड़ा 34 अरब डॉलर पहुंचने का अनुमान है। नैसकॉम के अनुसार भारत में अगले एक साल में ही इस फील्ड में एक लाख से ज्यादा नई नौकरियां मिल सकती हैं। अधिकतर नौकरियां आईटी के अलावा रिटेल, एफएमसीजी और कंसल्टिंग सेक्टर में मिलेंगी।
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Web Title: Data Analytics Demand More Then Engineers In India
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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