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CCE: पास होने वाले छात्र बढ़े, परीक्षा का दबाव कम हुअा, लेकिन प्रोजेक्ट्स का बढ़ा

7 वर्ष पहले
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सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एजुकेशन ने वर्ष 2009 में कंटीनुअस एंड कॉम्प्रिहेंसिव इवैल्यूएशन सिस्टम की शुरुआत की थी और 2011 में दसवीं कक्षा के छात्रों के लिए बोर्ड परीक्षा को ऑप्शनल बनाया गया था। सीसीई लागू करने का सबसे महत्वपूर्ण कारण छात्रों के ऊपर परीक्षा का दबाव कम करना और असेसमेंट की ऐसी प्रक्रिया विकसित करना था जिससे छात्रों का पर्सनैलिटी डेवलपमेंट भी सुनिश्चित हो सके। लेकिन पिछले कुछ महीनों से इसमें बदलाव की मांग तेज हो रही है। हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के साथ चर्चा में छात्रों ने दसवीं में बोर्ड परीक्षा को फिर अनिवार्य करने की मांग की है। सीसीई सिस्टम की खामियां और इसमें बदलाव के कारणों की चर्चा आज एजुकेशन भास्कर में...
सालभर में छह टेस्ट, मार्क्स की जगह ग्रेड
छठवीं से दसवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए लागू सीसीई के तहत एनुअल एग्जाम की जगह सालभर लगातार असेसमेंट की व्यवस्था है। इसके लिए साल में चार फॉर्मेटिव असेसमेंट और दो समेटिव असेसमेंट टेस्ट होते हैं। इसमें प्रोजेक्ट, असाइनमेंट, एक्स्ट्रा कॅरिकुलर एक्टिविटीज आदि के आधार पर छात्रों को परखा जाता है। अंतिम रिजल्ट में फॉर्मेटिव असेसमेंट को 40 फीसदी और समेटिव असेसमेंट को 60 फीसदी वेटेज दिया जाता है। छात्रों को मार्क्स की जगह ग्रेड दिए जाते हैं।
बिना तैयारी के हुई शुरुआत
सीसीई सिस्टम की अनुशंसा 1968 में कोठारी कमीशन ने की थी। नेशनल कमीशन ऑन एजुकेशन और नेशनल कॅरिकुलम फ्रेमवर्क ने भी इसकी सिफारिश की थी, लेकिन इसे बिना किसी खास तैयारी के लागू कर दिया गया। एक सर्वे के अनुसार सीसीई के बारे में ट्रेनिंग के लिए प्रति टीचर 10 हजार रुपए एक साल में खर्च करने की जरूरत थी। 2012 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि 67% शिक्षक और 58% छात्र सीसीई के खिलाफ थे क्योंकि उन्हें इसके बारे में पूरी जानकारी ही नहीं थी।
कमियां : असाइनमेंट के लिए छात्र, बेहतर रिजल्ट के लिए स्कूल अपनाते हैं गलत तरीके
  • ग्रेडिंग सिस्टम: सीसीई में 90 से 99 फीसदी तक अंक लाने वाले छात्रों को एक ही ग्रेड मिलती है। छात्र ज्यादा अंक लाने की कोशिश करने की बजाय ग्रेड से ही संतुष्ट हो जाते हैं।
  • असेसमेंट का तरीका: स्कूल-बेस्ड एग्जाम में अपने छात्रों की बेहतर ग्रेड के लिए स्कूल अक्सर गलत तरीके अख्तियार करते हैं। इससे ज्यादा प्रतिभाशाली छात्रों को नुकसान होता है।
  • प्रोजेक्ट्स और असाइनमेंट्स: फॉर्मेटिव और समेटिव असेसमेंट के लिए छात्रों को पूरे साल प्रोजेक्ट्स, असाइनमेंट्स और अन्य एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेना होता है। छात्र अक्सर इसके लिए नकल का सहारा लेते हैं।
  • सेल्फ स्टडी के लिए समय नहीं: पूरे साल होने वाले टेस्ट के चलते छात्रों को सेल्फ स्टडी के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता। वे कंपीटिटिव एग्जाम्स की तैयारी भी नहीं कर पाते।
  • बारहवीं में बोर्ड परीक्षा: सीबीएसई ने केवल दसवीं कक्षा के छात्रों के लिए ही बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक बनाया है। बारहवीं कक्षा में ऐसी व्यवस्था नहीं है।
कम हो रहा है स्कूल-बेस्ड एग्जाम चुनने वाले छात्रों का अनुपात
देश के कई हिस्सों, खासकर महानगरों में स्कूल-बेस्ड एग्जाम का विकल्प चुनने वाले छात्रों का अनुपात पिछले दो साल में कम हुआ है। 2012 में मुंबई में दसवीं कक्षा के 34 फीसदी छात्र स्कूल-बेस्ड एग्जाम में शामिल हुए थे, लेकिन 2013 में यह आंकड़ा कम होकर 13 फीसदी रह गया। दिल्ली में भी वर्ष 2013 में करीब 2 लाख 85 हजार छात्रों ने स्कूल-बेस्ड एग्जाम का विकल्प चुना था, जो 2014 में करीब 10 फीसदी (2.59 लाख) कम हो गया।
...लेकिन पास पर्सेंटेज बढ़ा, बारहवीं में परफॉर्मेंस भी बेहतर
सीसीई लागू होने के बाद से दसवीं कक्षा के पास पर्सेंटेज में करीब 10 फीसदी का इजाफा हुआ है। 2009 में देशभर में 88.94 फीसदी छात्र दसवीं की बोर्ड परीक्षा में पास हुए थे। 2013 में यह आंकड़ा बढ़कर 98.76 फीसदी हो गया। सीबीएसई की एक रिपोर्ट के अनुसार दसवीं में बोर्ड की बजाय स्कूल-बेस्ड एग्जाम चुनने वाले छात्र बारहवीं में बेहतर परफॉर्म करते हैं। सीसीई के पांच साल पूरे होने पर बोर्ड ने इस साल की शुरुआत में असेसमेंट रिपोर्ट तैयार की थी।
इसमें बताया गया है कि दसवीं की स्कूल-बेस्ड एग्जाम में 80 फीसदी से ज्यादा अंक हासिल करने वाले 55.60 फीसदी छात्रों को बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में भी 80 फीसदी से ज्यादा अंक मिले। वहीं दसवीं की बोर्ड परीक्षा में 80 फीसदी से ज्यादा अंक लाने वाले 47.48 फीसदी छात्र ही बारहवीं में ऐसा कर पाए।