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8वीं के 25 परसेंट छात्र ही दूसरी की किताबें पढ़ने में सक्षम, कैसे होगी लर्निंग

6 वर्ष पहले
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सभी फोटोज का इस्तेमाल डिजिटल प्रजेंटेशन के लिए किया गया है. - Dainik Bhaskar
सभी फोटोज का इस्तेमाल डिजिटल प्रजेंटेशन के लिए किया गया है.
तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले केवल 25 फीसदी छात्र ही दूसरी कक्षा के पाठ सही-सही पढ़ सकते हैं। आठवीं कक्षा के भी 25 फीसदी छात्र दूसरी की किताबें फर्राटे से पढ़ सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूली शिक्षा की यही हालत है। 6-14 वर्ष के बच्चों को अनिवार्य प्राइमरी एजुकेशन का लक्ष्य करीब है। इस उम्र के 96.7 फीसदी बच्चे स्कूलों की रजिस्टर में हैं, लेकिन बीते छह साल से इस आंकड़े में खास बदलाव नहीं हुआ। (एजुकेशन, जॉब की और खबरों को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)
लर्निंग के स्तर में तो और गिरावट आई है। प्राइमरी स्कूलों में शिक्षकों की कमी इसका सबसे बड़ा कारण है। तकनीक के इस्तेमाल से इस समस्या का असर कम हो सकता है, लेकिन बेहतर लर्निंग के लिए शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था जरूरी है।
बड़ी चिंता: प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले छात्र बढ़े, लेकिन लर्निंग का स्तर कमजोर
बीते पांच वर्षों में छात्रों की लर्निंग के स्तर में लगातार गिरावट आई है। 2010 में दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले 13.4 फीसदी छात्र अक्षर की पहचान नहीं कर सकते थे, 2014 में यह अनुपात ढाई गुना बढ़कर 32.5 फीसदी हो चुका है। इस दौरान प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों का अनुपात 23.7 से बढ़कर 30.8 फीसदी हो गया। शहरी इलाकों में तो 39 फीसदी छात्र प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं।
वर्षअक्षर नहीं पहचानने वाले दूसरी कक्षा के छात्रप्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले 6-14 वर्ष के बच्चे
201013.423.7
201119.925.6
201224.828.3
201328.529.0
201432.530.8
- सभी आंकड़े परसेंट में
स्कूल में शिक्षक नहीं, पढ़ाने का तरीका भी पुराना
9 लाख शिक्षक कम: देश के करीब 14 लाख स्कूलों में नौ लाख से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली हैं। प्राइमरी स्कूलों में 5.86 लाख और अपर प्राइमरी स्कूलों 3.5 लाख शिक्षक कम हैं।
स्कूल नहीं जाते बच्चे: प्राइमरी स्कूलों में 71.4 और अपर प्राइमरी स्कूलों में 71.1 फीसदी छात्र ही स्कूल जाते हैं। वर्ष 2013 के मुकाबले प्राइमरी स्कूल में अटेंडेंस बढ़ा है जबकि अपर प्राइमरी स्तर पर थोड़ा कम हुआ है।
पुराने लर्निंग टूल्स: स्कूलों में बच्चों को सिखाने के लिए अब भी पारंपरिक तरीके इस्तेमाल होते हैं। इंटरेक्टिव, पिक्टोरियल या तकनीक पर आधारित नए तरीकों के बारे में शिक्षक भी नहीं जानते।
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