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हर पड़ाव पर फेल हुए, लेकिन एक दिन चार्टर्ड अकाउंटेंट बन कर ही माने

एक बार जब उन्होंने सीए बनने की ठानी तो बार-बार असफलता भी उनका रास्ता रोक नहीं सकी।

bhaskar news | Last Modified - Mar 09, 2016, 10:25 AM IST

एजुकेशन डेस्क. सूरत में रहने वाले तिनिस मोदी का पढ़ने में ज्यादा मन नहीं लगता था। एक बार जब उन्होंने सीए बनने की ठानी तो बार-बार असफलता भी उनका रास्ता रोक नहीं सकी।
खेलने रहता था मस्त, 50 फीसदी अंक मिलने पर होती थी खुशी...
शुरुआत से ही खेलने और तीज-त्योहार में मशगूल रहने वाला था। साल के चार महीने तो पतंगबाजी में ही बीत जाते थे। इसलिए पढ़ाई में बिल्कुल ही औसत दर्जे का विद्यार्थी था। 50 प्रतिशत अंक भी मिल जाएं तो खुशी होती थी। इस कारण मेरे परिवार ने भी मुझसे कोई खास अपेक्षा नहीं लगा रखी थी। घर के लोगों ने चार्टर्ड अकाउंटेंट की पढ़ाई का सुझाव दिया, लेकिन फैसला हुआ कि मुझे टेक्सटाइल क्षेत्र में कॅरिअर बनाना है।
मैंने इसके लिए बेमन से हां तो कह दिया, किन्तु मुझे अंदर से महसूस हो रहा था कि आखिर क्या है कि मैं सीए की पढ़ाई नहीं कर सकता। हालांकि, मैं अपने कमजोर पहलुओं को बखूबी जानता था। मैं इतना मेधावी नहीं था कि आसानी से सीए बन सकूं, लेकिन मैंने निश्चय किया मुझे यही बनना है। घर के सभी सदस्यों ने मेरा उत्साह बढ़ाया।
ऐसे हुई शुरुआत
जब मैंने शुरुआत की तब मुझसे किसी को उम्मीद नहीं थी। पापा इनकम टैक्स प्रैक्टिशनर थे, मैं उनके साथ दफ्तर जाकर बैठता था। वह जो काम बताते करता। इसी दौरान मैंने सीए-इन्टर की परीक्षा दी और परिणाम का दिन आया। मैं स्कूली शिक्षा के दौरान भी सिर्फ दसवीं और बारहवीं में ही फर्स्ट डिवीजन से पास हुआ था। तब अखबारों में परिणाम जारी होता था। सुबह हाथ में अखबार आते ही परिणाम वाला पन्ना छान मारा। मेरा रोल नंबर नजर नहीं आया। घर पर परिणाम की सूचना देनी थी, ये उस दिन की मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती की तरह था। भारी मन से घर के सदस्यों को बताया कि मैं फेल हो गया हूं। हर सदस्य ने कहा कोई बात नहीं, फिर से मेहनत करना। फेल होने से कोई जीवन थोड़े बीत जाता है। मुझे बहुत अच्छा लगा और लक्ष्य भी
काफी कुछ आंखों के सामने साफ होता प्रतीत हुआ।

फेल होने पर हुआ था निराश, लगा सीए नहीं बन पाउंगा...
मैं दोबारा तैयारी में जुट गया। इन्टर पास की, फाइनल में आया। बहुत मेहनत की किन्तु फाइनल क्लियर नहीं कर पाया। इस बार मुझे बहुत दु:ख हुआ। मुझे गहरा एहसास होने लगा कि सीए बनना अपने बूते की बात नहीं है। मैं सीए बनना नहीं चाहता। घर के सदस्यों को जेहन में आई इस बात को बताया। घर में इसी समय मेरे विवाह की बातें चल रही थीं। पिता ने मुझसे केवल इतना कहा कि कॅरिअर का हर फैसला अब मुझे खुद लेना है और समय बीत जाने पर इसका मौका दोबारा नहीं मिलता।
पिता का मिला प्रोत्साहन... आखिर मिली कामयाबी...
पिता के प्रोत्साहन ने मुझे निराशा से उबार कर पुन: जुट जाने को प्रेरित किया। मैंने फिर से फाइनल की परीक्षा दी। परिणाम आने से पहले ही मेरी शादी भी हो गई थी। कुछ महीने बाद रिजल्ट आया तो मैं पास हो गया था। फेल होने का डर अब भी मेरे मन में है, लेकिन अब ये जानता हूं कि दुनिया वहीं खत्म नहीं हो जाती। तय कर लें तो कामयाबी देर से ही, मिलती जरूर है।
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