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हिरोशिमा-नागासाकी परमाणु हमला: जानें दूसरे देशों में क्या पढ़ाते हैं लोग

7 वर्ष पहले
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Nagasaki Bombing - Dainik Bhaskar
Nagasaki Bombing
(नागासाकी परमाणु बम हमले के बाद की एक तस्वीर)
जापान के नागासाकी शहर पर 1945 में आज ही के दिन 9 अगस्त को अमेरिका ने परमाणु बम गिराया था। इससे तीन दिन पहले 6 अगस्त को हिरोशिमा पर बम गिराया गया। इस घटना से पूरी दुनिया दहल गई थी। कई देशों ने इसकी आलोचना की थी। वहीं अमेरिका ने इसे सही कार्रवाई बताया। विभिन्न देशों के स्कूली पाठ्यक्रम में इस घटना को स्थान दिया गया है। हर देश ने अपनी तरह से इस घटना का विश्लेषण किया। परमाणु बम हमले की बरसी पर जानिए किस देश में किस तरह इस घटना के बारे में पढ़ाया जा रहा है...
अमेरिका : मजबूरी थी बम गिराना
अमेरकी स्कूलों में शुरुआत से ही तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पढ़ाया जाता है। हाई स्कूल की किताबों में बताया गया है कि हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराना मजबूरी थी। इससे युद्ध जल्दी खत्म हुआ और दस लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों की जान बच गई। जबकि सच्चाई यह है कि बमबारी के काफी पहले से जापान सरेंडर करने को तैयार था। इसके बदले में वह अपने राजा की सुरक्षा चाहता था। उसकी यह मांग बाद में पूरी भी हुई। ट्रूमैन एडमिनिस्ट्रेशन ने बमबारी को जायज ठहराने के लिए ऐसे तर्कों को बढ़ावा दिया, लेकिन युद्ध में शामिल रहे शीर्ष अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने भी बाद में माना कि इसकी कोई जरूरत नहीं थी।
जर्मनी: हम तो बचाने वालों में थे
युद्ध में जर्मनी की भूमिका सेवियर (बचाने वाला) के रूप में बताई गई है। कुछ स्कूलों-किताबों में हालांकि जर्मनी को युद्ध में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार भी बताया गया है। इनमें हिटलर द्वारा पोलैंड पर कब्जा, पर्ल हार्बर पर जापानी हमले आदि के बारे में भी पढ़ाया जाता है लेकिन कॉलेजों में इन सब चीजों के लिए अमेरिका को जिम्मेदार बताया जाता है। छात्रों को पढ़ाया जाता है कि युद्ध की असली वजह अमेरिका था जबकि जर्मनी ने लोगों को बचाने के लिए हरसंभव कोशिश की गई थी।
जापान: अमेरिका की जिद
स्कूली किताबों में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुई बमबारी के बारे में कम ही जानकारी दी गई है। जो थोड़ा-बहुत पढ़ाया जाता है, वह बमबारी के लिए अमेरिका को जिम्मेदार बताने और जापान की असहा स्थिति के बारे में है। बम गिराने को अमेरिका की जिद बताते हुए छात्रों को बताया जाता है कि जापान की हालत तो पहले ही काफी खराब हो चुकी थी। अर्थव्यवस्था जर्जर हो चुकी थी, 60 से ज्यादा शहर ध्वस्त हो चुके थे और देश बिखराव की कगार पर था। इसके बावजूद अमेरिका ने अपनी ताकत दिखाने के लिए उसके ऊपर परमाणु बम गिराए।
फ्रांस: हम जर्मनी के साथ नहीं थे
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी ने उत्तरी फ्रांस पर कब्जा कर लिया था। यहां की किताबों में चार्ल्स डि गुल की सेना की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। लेकिन इससे महत्वपूर्ण यह है कि किताबों में पढ़ाया जाता है कि फ्रांस आमतौर पर युद्ध के पक्ष में नहीं था और जर्मनी का साथ भी नहीं देना चाहता था। हालांकि, कुछ फ्रांसीसी जरूर जर्मनी के साथ मिले हुए थे।
रूस: हम तो विजेता हैं
स्कूलोंमें रूस को युद्ध के विजेता के रूप में दर्शाया जाता है। छात्रों को बताया जाता है कि रूस ने लगातार चार साल तक अपनी जमीन पर लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की। लेकिन इतिहास की किताबों में रूसी सेना के उकसाने वाले कामों जैसे कैटीन का नरसंहार आदि के बारे में खास चर्चा नहीं की गई है। 1940 में रूसी सेना ने करीब 22 हजार पोलिश सैनिकों की हत्या कर दी थी।
और भारत में : मानव सभ्यता के लिए खतरा
मध्यप्रदेश में हायर सेकेंड्री की सामान्य अंग्रेज़ी में हिरोशिमा पर एक अध्याय था। इसमें बताया गया था कि बम गिराने के समय अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और चीन में नैतिक रूप से कमजोर नेता थे। इसी कमजोरी के कारण बम गिराने का फैसला हुआ। अध्याय के दूसरे हिस्से में बम गिराने के बाद हिरोशिमा में हुई विनाशलीला का हृदय विदारक वर्णन था। हालांकि, अब यह पाठ हटा दिया गया है। सीबीएसई बोर्ड की 8वीं कक्षा के सामाजिक अध्ययन विषय के अंतर्गत डिज़ास्टर मैनेजमेंट (आपदा प्रबंधन) में इसके बारे में बताया गया है। मनुष्य निर्मित आपदा (मैन-मेड डिज़ास्टर्स)सेक्शन में इसका जिक्र किया गया है। परमाणु बम और हाइड्रोजन बम के उपयोग को गंभीरतम खतरा बताया गया है। ये पूरी मानव जाति को नष्ट कर सकते हैं।
आगे की स्लाइड्स में देखें नागासाकी बम विस्फोट की कुछ तस्वीरें...