(सांकेतिक फोटो)
इंजीनियरिंग स्टूडेंट प्रभात खरे को पढ़ाई पूरी करने के बाद पहली नौकरी एक आईटी कंपनी का मैनेजमेंट संभालने की जिम्मेदारी के रूप में मिली। प्रभात की रुचि मैनेजमेंट से ज्यादा सॉफ्टवेयर विकसित करने में थी, लेकिन नौकरी का मोटा पैकेज उन्हें अपना पसंदीदा काम करने से रोक रहा था। आखिरकार प्रभात ने तय किया कि कुछ सालों तक यह काम करके, खुद को मजबूत स्थिति में लाकर फिर वे अपने पसंदीदा काम से जुड़ेंगे।
वित्तीय सुरक्षा को दिमाग में रखते हुए प्रभात ने इस नौकरी का विकल्प चुना, करियर उन्हें सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में ही बनाना था। इस नौकरी के साथ-साथ प्रभात ने फ्रीलांसर के रूप में सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट लेने शुरू किए। वे तजुर्बे के लिए यह तैयारी कर रहे थे। 4-5 साल में प्रभात ने न केवल वित्तीय रूप से खुद को मजबूत किया, बल्कि एक प्रतिष्ठित सॉफ्टवेयर कंपनी में उच्च पद भी हासिल किया।
दरअसल प्रभात ने अपनी करियर प्लानिंग व्यवस्थित ढंग से की थी। उन्होंने शॉर्ट टर्म व लॉन्ग टर्म गोल्स के रूप में अपने मकसद तय किए थे। छोटी अवधि के लक्ष्य के रूप में प्रभात ने बेहतर वेतन देने वाली नौकरी स्वीकारी और भविष्य के लिए पूंजी जमा की। लंबी अवधि के मकसद के तौर पर उन्होंने अपना पसंदीदा करियर चुना।
लंबी अवधि के उद्देश्य से जुड़ना व्यावहारिक नहीं
वास्तविकता में जहां पुरानी पीढ़ियां अपने करियर को दूरदृष्टि के साथ देखती थीं, वर्तमान पीढ़ी इस मामले में बिल्कुल अलग है। भारी-भरकम लोन, कई पेशेवर विकल्पों और एंटरप्रेन्योरशिप से प्रेरित युवा प्रोफेशनल अपने करियर की शुरुआत को लेकर अलग ढंग से सोचते हैं और लंबी अवधि व छोटी अवधि के मकसद अपनी जरूरत के अनुसार तय करते हैं।
इंटरनेशनल रिलेशंस में मास्टर्स करने वाले कार्तिक कपूर डिजिटल स्पेस में काम कर रहे हैं। वे कहते हैं, मेरे पिता ने एक ही संस्थान में काम करते हुए 30 साल बिता दिए और अंतत: वे शीर्ष पद पर पहुंचे, लेकिन मैं इस तरह काम करने के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकता। करियर के अनगिनत विकल्पों के चलते अब किसी भी लंबी अवधि के उद्देश्य से जुड़ना व्यावहारिक नहीं है। मैं किसी भी नौकरी में तब तक काम कर सकता हूं जब तक कि उस काम में मेरी दिलचस्पी हो। रुचि खत्म होने पर मैं नौकरी बदल लूंगा।
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