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खाने को रोटी नहीं थी, सिर्फ 27 पैसे लेकर आए थे मुंबई

मशहूर लेखक जावेद अख्तर की रियल लाइफ की कहानी किसी फिल्मी स्टोरी से कम नहीं। 4 अक्टूबर सन् 1964 को जब वे पहली बार मुंबई पहुंचे तो उनकी जेब में महज 27 पैसे थे। न ही मुंबई में रहने के लिए घर था और न ही खाने के लिए रोटी।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Jan 17, 2017, 12:05 AM IST

  • सेल्फ हेल्प डेस्क। मशहूर लेखक जावेद अख्तर की रियल लाइफ की कहानी किसी फिल्मी स्टोरी से कम नहीं। 4 अक्टूबर सन् 1964 को जब वे पहली बार मुंबई पहुंचे तो उनकी जेब में महज 27 पैसे थे। न ही मुंबई में रहने के लिए घर था और न ही खाने के लिए रोटी।
    डायरेक्टर ने कहा था कभी राईटर नहीं बन सकते...
    मुंबई आने के 5 साल बाद तक उनकी यही हालत रही। एक बार तो एक सीन डायरेक्टर के पास लेकर तो डायरेक्टर ने सीन पढ़ा और उसे जावेद अख्तर के मुंह पर यह कहते हुए मार दिया कि तुम कभी राईटर नहीं बन सकते। ऐसे ही तमाम संघर्षों ने जावेद को कुछ बनने के लिए इंस्पायर कर दिया था।
    आगे की स्लाइड्स में जानिए आखिर कैसे सफल हुए जावेद…
  • मां गुजर गईं, पिता मुंबई में थे

    > जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी सन् 1945 को ग्वालियर में हुआ। बाद में पढ़ाई के लिए अलीगढ़ आ गए। जब वे महज 8 साल के थे तब उनकी मां गुजर गईं थी। पिता मुंबई नौकरी करने चले गए थे।
    > मैट्रिक तक की पढ़ाई अलीगढ़ से करने वाले जावेद बचपन से ही फिल्मी गानों के शौकीन थे लेकिन उनकी खाला के घर में गाने गाना तो दूर गाने सुनना भी मना था। इसी कारण वे स्कूल आते-जाते समय तेज आवाज में गाना गाया करते थे।
  • फुटपाथ पर सोते थे, खाना भी न था नसीब

    > भोपाल के सेफिया कॉलेज से ग्रैजुएशन करने के बाद जावेद अपना करियर बनाने मुंबई चले गए। मुंबई में दो साल बीतने के बाद भी उन्हें कोई खास काम नहीं मिल सका।

    > दो साल में एक छोटी से फिल्म में बड़ी मुश्किल से डायलॉग लिखने का काम मिला। जिसके उन्हें 100 रुपए मिला करते थे। वे काम की तलाश में इधर-उधर भटकते रहते थे।
  • सोच लिया था इस मिल्ज के सामने कार कार से होकर जाऊंगा…

    > एक कॉमेडी पिक्चर के सीन लिखने के बाद जब वे दादर में प्रोड्यूसर के घर पैसे मांगने गए थे
    तो उनकी जेब में इतने ही पैसे थे जिससे या तो वे बस से घर पहुंच जाएं या फिर कुछ खा लें।

    > उन्होंने चने लेकर पैदल चलते हुए आने का फैसला किया। जब वे कोहेनूर मिल्ज के गेट के सामने से गुजर रहे थे तभी उन्होंने सोच लिया था कि एक दिन इसी के सामने से मैं अपनी कार से जरूर होकर जाऊंगा।
  • स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ा करते थे…

    > कुछ सालों बाद वे कमाल स्टूडियों में रहने लगे। स्टूडियो के कम्पाउंड में ही इधर-उधर सो जाया करते थे। अंधेरी स्टेशन के पास एक सेकंड हेंड किताब बेचने वाले व्यक्ति से मुलाकात हो गई थी उससे किताबें लेकर स्ट्रीट लाइट के नीचे डिम लाइट में पढ़ते रहते थे।

    > वे अंधेरी में ऐसे एरिये में भी रहे हैं जहां साधु चरस-गांजा पीकर पड़े रहते थे और मच्छरों की भरमार थी। 5 साल बाद सन 1969 तक भी जावेद इसी तंगहाली के बीच मुंबई में संघर्ष करते रहे।
  • बहुत ज्यादा शराब पीने लगे थे…

    > नवंबर 1969 में उन्हें सही मायनों में ब्रेक मिला। सीता और गीता के सेट पर उनकी मुलाकात हनी ईरानी से हुई और चाह माह बाद ही दोनों ने शादी कर दी।

    > इसके बाद जावेद के तंगहाली के दिन बीत चुके थे उन्होंने 6 सालों में एक के बाद एक सुपर हिट फिल्में दी। इसी दौरान वे बहुत ज्यादा शराब भी पीने लगे लेकिन अचानक ही एक दिन उन्होंने शराब को हमेशा के लिए छोड़ दिया।
  • इतना कामयाबी के बाद भी बेचैनी होती है…

    > आज जावेद अख्तर किसी पहचान के मोहताज नहीं। फिर भी वे मानते हैं कि जितना वे कर सकते हैं उसका एक चौथाई भी उन्होंने अभी तक नहीं किया।

    > सरकार उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण से नवाज चुकी है। साहित्य अकादमी के साथ ही ढेरों फिल्म फेयर अवॉर्ड्स भी उन्हें मिल चुके हैं।

    > हिना ईरानी से तलाक के बाद उन्होंने शबाना आजमी से शादी की। उनके बेटे फरहान अख्तर और जोया अख्तर भी अब इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान कायम कर चुके हैं।

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