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9वीं में थर्ड डिवीजन आने पर घरवालों ने लगाया था खेती में, आज हैं सर्जन

नौवीं में थर्ड डिवीजन आने के बाद घरवालों ने भी उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन वे आज सर्जन हैं।

bhaskar news | Last Modified - Mar 08, 2016, 12:11 PM IST

दिनेश ने खराब रिजल्ट को ही अपनी प्रेरणा बना लिया। नौवीं में थर्ड डिवीजन आने के बाद घरवालों ने भी उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन वे आज सर्जन हैं।
दिनेश यादव स्कूल के कमजोर बच्चों में गिने जाते थे। नौवीं कक्षा में तो थर्ड डिवीजन से पास हुए। परिवार वालों ने पढ़ाई में रुचि नहीं देख खेत पर भेजना शुरू कर दिया।
खेतीबाड़ी का काम कठिन था। थोड़े ही दिनों में उन्हें पढ़ाई का महत्व समझ में आ गया और दसवीं कक्षा अच्छे नंबर से पास करने की ठान ली।
स्कूल से घर आने के बाद खाना खाते और किताबों को लेकर खेत में बनी कोठरी पर पहुंच जाते। दिन रात पढ़ाई करते। 1987 में दसवीं का परिणाम आया तो स्कूल के बोर्ड पर चस्पा लिस्ट को दोस्तों के साथ थर्ड डिवीजन से देखना शुरू किया। इसके बाद सेकंड डिवीजन की लिस्ट देखी तो वहां भी नाम नहीं मिला। दोस्तों ने कहा कि वह फेल है। उन्होंने सप्लीमेंट्री की लिस्ट देख डाली।
अंत में जब प्रथम श्रेणी की लिस्ट देखी तो वे स्कूल टॉपर थे।
दसवीं के बेहतर रिजल्ट पर घरवालों ने उन्हें पढ़ने के लिए अलवर भेज दिया। 1988 में 80 प्रतिशत से हायर सेकंडरी पास की। इसके बाद बीएससी प्रथम वर्ष 72 प्रतिशत अंकों से पास की और पीएमटी की तैयारी शुरू कर दी।
पीएमटी की तैयारी भी अलवर में ही रहकर घर पर की। 1990 में पहले प्रयास में सलेक्शन
वेटेरनरी में हुआ। अब खुद पर विश्वास भी बढ़ चुका था। 1991 में फिर से पीएमटी की परीक्षा दी और प्रदेश में 42 वीं रैंक आई। बाद में जयपुर एसएमएस मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया और अजमेर मेडिकल कॉलेज से सर्जरी में एमएस किया।
डॉ. यादव आज राजीव गांधी सामान्य चिकित्सालय में जनरल एवं लैप्रोस्कोपिक सर्जन हैं। कोटकासिम तहसील के गांव करीरिया बास के रहने वाले डॉ. दिनेश यादव का कहना है कि जीवन में लक्ष्य लेकर मेहनत करो तो कुछ भी असंभव नहीं है।
एक दो असफलता से जीवन में प्रगति के रास्ते बंद नहीं होते। असफलता से कभी निराश नहीं हो, बल्कि असफलता ही सफलता के रास्ते दिखाती है। वे कहते हैं खेती, व्यापार,नौकरी,खेल सभी से आसान काम है पढ़ना, बस एक बार माइंडसेट चेंज करना है।
डॉ.यादव बताते हैं कि उन्होंने दसवीं तक की पढ़ाई बूढ़ी बावल के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से की। पिता सरकारी टीचर थे। परिवार में छह भाई थे।
नौवीं में थर्ड डिवीजन आने पर उनके मन में कई तरह के विचार आए कि किसी तरह दसवीं कर के फौज या पुलिस में ही भर्ती हो जाएंगे। लेकिन लक्ष्य एक था कि दसवीं में अच्छे नंबर लाने ही है। यह सोचकर पढ़ाई करना शुरू किया।
दसवीं में स्कूल टॉपर बनने पर एक बार तो दोस्तों व घर वालों को भी विश्वास नहीं हुआ। इसके बाद परिवारजन भी समझ गए कि मैं पढ़ सकता हूं।
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