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कभी मुश्किल से पास होते, कोई बना जस्टिस तो कोई IPS और कोई अार्टिस्ट

जस्टिस, आईपीएस अफसर समेत महत्वणूर्ण पदों पर पहुंचे कम स्टूडेंट्स की सक्ससेस स्टोरीज।

bhaskar news | Last Modified - Mar 03, 2016, 11:17 AM IST

  • एजुकेशन डेस्क. ये ऐसी हस्तियों की स्टोरी हैं, जो पढ़ाई के दौरान आम स्टूडेंट्स जैसे ही थे। कभी मुश्किल से पास हुए, कभी नंबर कम आए। परीक्षा के मौसम में बच्चों के लिए ये कहानियां उम्मीद जगाने वाली हैं...
    तब मां ने समझाया था, केमिस्ट्री में पासिंग मार्क ही आए थे...
    ''11वीं में पीसीएम लिया, लेकिन केमिस्ट्री समझ नहीं आती थी। हाफ ईयरली एग्जाम शुरू हुए थे। मैंने मां
    को बताया कि मेरी पढ़ाई नहीं हुई है। मां ने समझाया जितनी तैयारी है उतना लिख आना। रिजल्ट में पासिंग 19 नंबर आए। तभी स्कूल प्राचार्य ने कहा-आपके केमिस्ट्री में नंबर कम आए हैं, आपसे हमें ऐसी अपेक्षा नहीं थी। यही बात दिल को छू गई। इसके बाद 12वीं में मैरिट में आठवीं रैंक मिली। ग्रैजुएशन में सबजेक्ट बदले। सिविल सर्विसेज में दूसरी बार में सफलता मिली। 2006 में आईपीएस बनी।''-रुचि वर्धन मिश्र, आईपीएस
    आगे दो नंबर कम आने से मेडिकल में नहीं हुआ एडमिश्जन, बने हाईकोर्ट में जस्टिस...
  • दो अंकों से मेडिकल में नहीं जा पाए लॉ की पढ़ाई की, हाईकोर्ट जज बने
    प्रसिद्ध कानूनविद् जस्टिस एनके जैन शिवपुरी जिले के मकरारा गांव से हैं। शुरू से ही अव्वल आए। मगर इंटरमीडिएट में सिर्फ दो नंबर कम आने से वे मेडिकल में सिलेक्ट होने से रह गए।
    बीएससी के बाद उनका सिलेक्शन मेडिकल में हो रहा था मगर एक जज अंकल ने कहा-एमबीबीएस की बजाए कानून की पढ़ाई करो। तब उन्होंने कानून की पढ़ाई की। 1964 में सिविल जज बने। 31 साल बाद हाईकोर्ट में जज बने। रिटायर होने के बाद कंज्यूमर कमीशन के चेयरमैन हुए।
    वे याद करते हैं-जब दो अंकों के कारण मेडिकल में चयन नहीं हुआ तो बहुत बुरा लगा था। मैं पढ़ने में अच्छा था। मगर हताशा एक पल के लिए हावी नहीं होने दी। मेरे पिता केसरीचंद जैन ने यही कहकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया-कोई भी असफलता आपके लिए अवसरों के दरवाजे बंद नहीं कर देती। उनकी बात से मुझे नई ताकत मिली। मैंने लॉ चुना और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। स्कूल की पढ़ाई तो शुरुआत है। पेरेंट्स की बड़ी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों की हिम्मत बढ़ाएं। उन पर भरोसा करें। संघर्ष करना सिखाएं। डराएं नहीं।
    आगे एमएससी प्रीवियस में 50 फीसदी अंक लाने आज हैं डीआईजी...
  • थोड़ा धैर्य भी रखिए... यूपीएससी में चार बार फेल हुआ

    ''मैं जब एमएससी में पहुंचा तो फर्स्ट इयर में 50 फीसदी से भी कम अंक आए। परेशान हुआ। फिर मेहनत की और अंतिम वर्ष में 76 फीसदी अंकों से पास हुआ। पहली बार वर्ष 1981 में यूपीएससी की परीक्षा दी। फेल हो गया। ऐसा चार साल तक हुआ। फिर भी हार नहीं मानी। वर्ष 1984 में पीएससी परीक्षा दी और 1986 बैच के एकाउंट ऑफिसर के लिए सलेक्ट हो गया। अगले साल फिर पीएससी की परीक्षा दी तो डीएसपी बना।'' डॉ.रमन सिंह सिकरवार, डीआईजी भोपाल
    हाई स्कूल में सेकंड डिवीजन आने वाला स्टूडेंट बना एजुकेशन में बड़ा अधिकारी...
  • डिविजन की मत सोचो हाईस्कूल में सेकंड डिवीजन आया
    ''उप्र के बंदायू जिले के सरकारी स्कूल में पहली से 12वीं तक की पढ़ाई की। कक्षा 1 से 9 वीं तक हमेशा टॉप 5 स्टूडेंट्स में रहा। हाईस्कूल परीक्षा का रिजल्ट जब आया तो सेकंड डिवीजन पास हुअा। अगले 10 दिन तक स्कूल नहीं गया। परिजनों ने 10 दिन तक काउंसलिंग की। कहा-मेहनत करो, आगे की पढ़ाई पर ध्यान दो। रिजल्ट अपने आप सुधर जाएगा। इसके बाद बीएससी, एमएससी और पीएचडी की।'' -एके सिंह, पूर्व परीक्षा नियंत्रक एवं वर्तमान में झाबुआ और शहडोल के आरजीपीवी यूआईटी के प्रभारी
    नौ वीं तक मार खाई लड़की बनी नामचीन आर्टिस्ट...
  • डांट ने ही काबिल बनाया, नौवीं तक टीचर्स से मार खाई है

    ''मैंने कक्षा 9वीं तक टीचर्स से मार खाई है। उस वक्त बुरा तो बहुत लगता था, लेकिन कभी दिल पर
    नहीं लिया। लगता था, गलती की है, मार तो पड़ेगी ही। सालभर मेरे सिर्फ पासिंग मार्क्स ही आ पाते थे। पर
    फाइनल में अच्छे नंबर ले आती थी। 10वीं में साइंस में डिस्टकिंशन आई, लेकिन मैंने फिर भी आर्ट्स चुना।
    टीचर्स ने बहुत ताने मारे, लेकिन कुछ साल पहले उन्हीं ने स्कूल में सम्मानित भी किया। सितार के लिए भी शुरू में काफी रिजेक्शन झेला, पर आज उन्हीं जगहों पर खासतौर से आमंत्रित किया जाता है।'' -स्मिता नागदेव,
    सितार वादिका
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