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48 जंगल उगा चुका है ये शख्स, पर्यावरण बचाने छोड़ी थी लाखों की नौकरी

उत्तराखंड के रहने वाले एक इंजीनियर देश में जंगल उगाने के काम कर रहे हैं। सुनने में ये बात अजीब जरूर लगेगी, लेकिन पूरी तरह सच है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Jun 30, 2016, 12:18 PM IST

  • एजुकेशन डेस्क। उत्तराखंड के रहने वाले एक इंजीनियर देश में जंगल उगाने के काम कर रहे हैं। सुनने में ये बात अजीब जरूर लगेगी, लेकिन पूरी तरह सच है। दरअसल, शुभेंदु शर्मा टोयोटा के प्लांट में इंजीनियर थे। एक दिन उनके प्लांट में जापान के पर्यावरणविद अकिरा मियावाकी आए। मियावाकी से मिलने के बाद शुभेंदु की लाइफ अलग ट्रैक पर चली गई। ऐसे शुरू किया जंगल उगाने का काम...
    मियावाकी टोयोटा के परिसर में जंगल उगाने आए थे। शुभेंदु को अचरज हुआ कि क्या जंगल भी उगाया जा सकता है, क्योंकि प्राकृतिक रूप से किसी जंगल को साकार होने में कम से कम 100 साल का वक्त लगता है। 86 साल के मियावाकी ने बताया कि कैसे प्रकृति के तौर- तरीकों में दस गुना रफ्तार लाकर 10 साल में जंगल खड़ा हो सकता है। वे दुनियाभर में 4 करोड़ पेड़ लगा चुके थे। बस, शुभेंदु पर भारत में जंगल उगाने की जिद सवार हो गई। उन्होंने मियावाकी के सहायक के रूप में काम करके उनकी विधि का अध्ययन किया।
    अपने घर में किया पहला प्रयोग :
    शुभेंदु ने पहला प्रयोग हुआ उत्तराखंड स्थित घर के पीछे के 93 वर्ग मीटर के बगीचे में। वहां वे एक साल में 42 प्रजातियों के 300 पेड़ लगाने में कामयाब रहे। इसके बाद तो उन पर जंगल उगाने की धुन सवार हो गई, लेकिन इस काम को नौकरी में रहते नहीं किया जा सकता था। अच्छी सैलरी वाली नौकरी छोड़ना आसान फैसला नहीं था। हालांकि, हिम्मत करके 2011 में नौकरी छोड़ी और एक साल तक सिर्फ रिसर्च की, क्योंकि भारतीय मिट्टी और पर्यावरण अलग होने के कारण मियावाकी की विधियों को हूबहू इस्तेमाल करने में खतरा था।
    आगे की स्लाइड्स पर जानिए शुभेंदु ने कैसे किया जंगल उगाने का काम...
  • 'एफारेस्ट' बनाकर शुरू किया काम :
    काफी प्लानिंग और रिसर्च के बाद उनके ध्यान में यह बात आई कि चूंकि इस काम में काफी वक्त और देखभाल की जरूरत होती है, इसलिए इसे चैरिटी की तरह नहीं चलाया जा सकता है। कोई ऐसा बिज़नेस मॉडल बनाना होगा, जो बहुत सस्ता हो, लेकिन उससे कंपनी का काम भी चल जाए। फिर जन्म हुआ 'एफारेस्ट' का। उन्होंने उस समय डेढ़ सौ रुपए प्रति वर्गफुट पर काम करने का फॉर्मूला तय किया। यह मियावाकी की तुलना में अत्यधिक सस्ता था। वे अब तक 54 हजार पेड़ लगा चुके हैं।
  • भारत में उगाए 48 जंगल :
    शुभेंदु ने पिछले चार सालों में अपनी टेकनिक और लगन की मदद से देशभर में 48 जंगल उगाए हैं। अपनी पहल को दुनिया भर में फैलाने के लिए शुभेंदु ओपन सोर्स बेस्ड प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे हैं। इस प्लेटफॉर्म की मदद से कोई भी अपने घर में अपना खुद का जंगल बना सकेगा। अगर शुभेंदु की ये पहल पूरी दुनिया में फैल जाए और लोग इसे अपनाते हैं तो इससे हमें ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से छुटकारा जरूर मिल सकता है।
  • जंगल उगाने के छह चरण :
    पहले मिट्टी का परीक्षण कर पता लगाते हैं कि उसमें क्या कमी है। फिर जलवायु और मिट्टी के मुताबिक पेड़ों की प्रजाति तय की जाती है। फिर स्थानीय तौर पर उपलब्ध मिट्टी के लिए पोषण देखा जाता है जैसे पोल्ट्री फॉर्म का अपशिष्ट, चीनी कारखानों से निकला बाय-प्रोडक्ट, कुछ भी हो सकता है। एक मीटर तक मिट्टी को जरूरी पोषण देने के बाद 80 सेमी ऊंचाई के पौधे लगाते हैं। प्रति वर्गफीट में 3 से 4 पौधे। इसके लिए 100 वर्गफीट का न्यूनतम क्षेत्र होना चाहिए। इससे इतना घना जंगल तैयार हो जाता है कि 8 माह बाद सूरज की रोशनी जमीन तक नहीं पहुंचती। इस स्थिति में आसमान से गिरी बारिश की हर बूंद अपने आप सहेजी जाती है और पेड़ों से गिरी हर पत्ती खाद का रूप ले लेती है। जितना जंगल बढ़ता है, उतना यह अपने लिए पोषक पदार्थ पैदा करता है।
  • देश को जंगल लौटाने का सपना :
    शुभेंदु का सपना है कि वे देश में सारे खोए जंगलों को पुन:लौटा लाएं। इसके लिए वे प्रयास कर रहे हैं कि सारी जानकारी शेयर कर सकें। इसके लिए उन्होंने एक वेबसाइट बनाई है। मिट्टी का परीक्षण करने के लिए जीपीएस आधारित सॉफ्टवेयर की भी योजना है। यह डाटा 'एफारेस्ट' के पास मौजूद जानकारी से मिलाने के बाद पता चल जाएगा कि मिट्टी को क्या चाहिए और इसमें कौन-से पेड़ उगाने चाहिए। सूरज की कितनी रोशनी जमीन पर पहुंच रही है, मिट्टी के पोषक तत्वों व नमी में परिवर्तन आदि को जांच कर जंगल की वृद्धि पर निगरानी रखी जा सकती है ताकि उनकी विधि का स्टेप-बाई-स्टेप पालन करके कोई भी जंगल उगा सके।
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