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पिता की टिकट बुकिंग से शुरू किया था बिजनेस, 1300 करोड़ का हुआ

हवाई टिकट की खरीद पर पैसे बचाने के मकसद से निशांत और रिकांत ने पिता की यात्राओं के लिए टिकट बुकिंग खुद करवानी शुरू की।

bhaskar news | Last Modified - Mar 03, 2016, 01:41 PM IST

  • हवाई टिकट की खरीद पर पैसे बचाने के मकसद से निशांत और रिकांत ने पिता की यात्राओं के लिए टिकट बुकिंग खुद करवानी शुरू की। जल्द ही वे इस काम को इतनी कुशलता से करने लगे कि इसमें उन्हें कामयाब बिजनेस की संभावनाएं नजर आईं जिसे उन्होंने पूरी मेहनत से हकीकत में तब्दील कर दिया। 2014- 15 में ईज माय ट्रिप की बिक्री 1300 करोड़ पर पहुंची।
    कंपनी : ईज माय ट्रिप
    संस्थापक : निशांत पिट्टी, रिकांत पिट्टी
    क्या खास : हवाई यात्रा के सस्ते टिकट और पर्यटन के लिए सस्ते पैकेज उपलब्ध करवाने वाला पोर्टल ट्रैवल
    कंपनी ईज माय ट्रिप की स्थापना और विस्तार एक कल्पना जैसा है जहां 17 और 19 साल के दो भाइयों ने मजे-मजे में ट्रैवल टिकट्स की बुकिंग शुरू की और आगे चलकर उनका यही आइडिया करोड़ों के व्यापार में तब्दील हो गया। पिछले वित्तीय वर्ष (2014- 15) में ईज माय ट्रिप की बिक्री 1300 करोड़ पर पहुंची। वर्तमान में 50,000 ट्रैवल एजेंट्स के नेटवर्क के साथ ईज माय ट्रिप प्रमुख ट्रैवल एजेंसियों में से एक है।
    दिलचस्प है कि इसकी शुरुआत ट्रैवल टिकट की खरीद पर कुछ पैसे बचाने के मकसद से हुई, लेकिन बिजनेस आइडिया के प्रति समर्पण और किफायती यात्रा सुविधाएं उपलब्ध करवाने के पिट्‌टी भाइयों के अनूठे विचार के चलते यह यात्रा एक सफल बिजनेस में बदल गई।
    आगे सस्ते टिकट खरीदने से हुई शुरुआत, 25 लाख टिकट की बिक्री का टार्गेट किया पूरा, घर के एक कमरे में पहली एजेंसी, चुनौतियों के बाद सफलता, मजबूत बिजनेस की ओर बढ़ाए कदम और पहले साल ही 33 करोड़ रुपए का टर्नओवर...
  • सस्ते टिकट खरीदने से हुई शुरुआत

    इस बिजनेस का बीज उस वक्त पड़ा जब 2004 में निशांत और रिकांत पिट्‌टी अपनी गर्मी की छुटि्टयां बिता रहे थे। निशांत इस समय कॉलेज के फर्स्ट ईयर में था और रिकांत 11वीं कक्षा में। उनके पिता को अपने कोल सप्लाई बिजनेस के लिए अक्सर यात्राएं करनी पड़ती थीं। उस समय ऑनलाइन ट्रैवल एजेंसियां चलन में नहीं थीं इसलिए टिकट बुकिंग के लिए निर्भरता ट्रैवल एजेंट पर थी।
    एक दिन जब रिकांत ने उन्हीं टिकट की कीमत ऑनलाइन चेक की तो पाया कि उनका ट्रैवल एजेंट टिकट की ऑनलाइन कीमत से काफी ज्यादा पैसा वसूल रहा था। इससे उनके पिता को काफी नुकसान हो रहा था। ऐसे में ट्रैवल एजेंट्स पर निर्भर होने के बजाय दोनों भाइयों ने उनकी टिकट सीधे एयरलाइंस की वेबसाइट से बुक करवानी शुरू की। इससे प्रति टिकट पर 300 से 500 रुपए की बचत होने लगी थी।
    पिता ने यह बात अपने सहकर्मियों और परिवार में शेयर की। जल्द ही रिश्तेदारों ने भी रिकांत व निशांत से टिकट बुकिंग करवानी शुरू की। रिकांत के अनुसार, हर दिन हम 10-15 टिकट बुक करते थे। मेरे स्कूल के दोस्तों ने भी अपने टिकट बुक करवाने के लिए हमारी मदद ली। तब हमें लगा कि अब हम यह नि:शुल्क नहीं कर सकते थे। हमने हर टिकट पर कुछ पैसा चार्ज करना शुरू किया। हर दिन औसतन 600 रुपए की कमाई होने लगी। अब हमने तय किया बुकिंग रिक्वेस्ट के लिए हम दोनों में कोई एक घर पर जरूर रुकेगा।
  • 25 लाख टिकट की बिक्री का टार्गेट

    जैसे-जैसे वॉल्यूम बढ़ने लगा एक एयरलाइन ने निशांत और रिकांत के आईपी एड्रेस को नोटिस किया
    जिससे लगातार बुकिंग हो रही थी। उन्होंने दोनों भाईयों को ट्रैवल पार्टनर बनने का ऑफर दिया। सामान्य तौर एयरलाइंस एक टिकट बेचने पर एजेंट को पांच प्रतिशत इन्सेंटिव देती है।
    पिट्‌टी भाइयों ने उन्हें छह
    प्रतिशत देने पर राजी कर लिया। हालांकि उनकी एक शर्त भी थी। 25 लाख रुपए जमा करवाने के साथ
    इतनी ही राशि के टिकट दो महीने में बेचने थे। ऐसे में रिकांत और निशांत ने पिता को आर्थिक मदद देने के
    लिए मनाया। लेकिन पहले दो सप्ताह में वे दो लाख की टिकट भी नहीं बेच पाए।
    25 लाख का टार्गेट तो बहुत दूर था। एक बार फिर दोनों ने पिता से मदद मांगी। उनके श्रीनगर और गुवाहाटी में अच्छे संपर्क थे। उनके जरिए हरेक शहर के लिए दो एजेंट रखे, जो उस एजेंट आईडी से टिकट बेचने के लिए तैयार हो गए। पांच दिनों में उन्होंने 10 लाख के टिकट बेच दिए। बाकी के 13 लाख निशांत व रिकांत ने एक महीने में बेचकर टार्गेट पूरा किया।
  • घर के एक कमरे में पहली एजेंसी

    जब कॉलेज शुरू हुआ तो निशांत और रिकांत ने यह काम रोक दिया, लेकिन आंत्रप्रेन्योरशिप का ख्याल
    अभी उनके दिमाग से निकला नहीं था। 2005 के अंत तक वे फिर से सक्रिय हुए। अब वे केवल बीटूबी सेग्मेंट पर फोकस करना चाहते थे। निशांत के अनुसार, हमने कुछ एयरलाइंस से बात की और उनके ट्रैवल एजेंट्स बन गए।
    सामान्य तौर पर किसी भी एयरलाइन से पार्टनरशिप की कीमत 20-25 लाख थी। यह काफी ज्यादा था और छोटे ट्रैवल एजेंट कई एयरलाइंस के साथ साझेदारी का खर्च नहीं उठा सकते। इसलिए हमने सोचा कि ऐसे ट्रैवल एजेंट्स के लिए हम टिकट बुक करवाएंगे और बेचे गए हरेक टिकट के लिए उन्हें कमिशन ऑफर करेंगे।
    वे बाद में टिकट की राशि हमारे खाते में जमा करवा सकते थे और इस तरह वे भारी निवेश से भी बच सकते थे। इस तरह हमारी ट्रैवल एजेंसी ड्यूक ट्रैवल्स की नींव पड़ी जिसकी शुरुआत घर के एक कमरे से हुई थी।
    चुनौतियों के बाद सफलता
    निशांत और रिकांत की कम उम्र उनके काम में मुश्किल बन रही थी। ट्रैवल एजेंट उन्हें गंभीरता से नहीं ले रहे थे। ऐसे में उन्होंने श्रीनगर और गुवाहाटी में अपनी पहुंच बढ़ाने पर फोकस किया क्याकिें यहां वे कई एजेंट्स को पहले से ही जानते थे।
    जुलाई 2006 तक उनके पास श्रीनगर और गुवाहाटी में 80 ट्रैवल एजेंट काम कर रहे थे। 2007 के खत्म होते-होते दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, गुजरात व कोलकाता के 400 ट्रैवल एजेंट पिट्‌टी भाइयों के
    बिजनेस से जुड़ गए। लेकिन तेजी से होते इस विस्तार के साथ सामंजस्य बिठाना भी आसान नहीं था। दिल्ली
    ऑफिस में मात्र पांच लोग थे, जो सभी एजेंट्स की रिक्वेस्ट को हैंडल कर रहे थे। यह संभव नहीं था और अन्य कई मुश्किलें भी आ रही थीं।
    बुकिंग प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए उन्होंने बीटूबी वेबसाइट पर काम करना शुरू किया ताकि एजेंट खुद बुकिंग कर पाएं। अंतत: 2008 में ईज माय ट्रिप डॉट कॉम लॉन्च हुई। काम के बीच दोनों भाइयों ने पढ़ाई भी जारी रखी।
  • मजबूत बिजनेस की ओर बढ़ाए कदम

    तेजी से होती ग्रोथ के चलते दोनों भाइयों ने जिम्मेदारियां बांट ली। निशांत ने एजेंट नेटवर्क्स बढ़ाने का काम हाथ में लिया वहीं रिकांत ने ऑपरेशंस, मार्टकेटिंग व टेक्नोलॉजी की जिम्मेदारी ली।
    इतना ही नहीं एडवरटाइजिंग के लिए कम बजट वाले तरीके काम में लिए जैसे गूगल एडवर्ट्स, ईमेलर्स और एसएमएस।
    पहले ही साल में कंपनी ने 33 करोड़ का टर्नओवर हासिल किया। 2500 एजेंट्स और 15 कर्मचारियों के साथ अब वे एक मजबूत स्थिति में थे। 2009 में 600 वर्ग फुट के ऑफिस में वे शिफ्ट हुए। साथ ही सेल्स टीम को भी मजबूती दी।
    2010 कंपनी के लिए अहम साल था। जब इस बिजनेस ने 100 करोड़ के टर्नओवर को पार किया। अब वे अपने बिजनेस को और विस्तार देना चाहते थे। चूंकि पहले यह व्यवसाय बीटूबी (बिजनेस टू बिजनेस) पोर्टल था जिस पर सिर्फ एजेंट ही काम कर सकते थे।
    पिट्‌टी भाइयों ने सीधे ग्राहकों को टिकट बेचने के लिए बीटूसी (बिजनेस टू कंज्यूमर) वेबसाइट पर काम किया। आगे चलकर रेडियो व टीवी पर विज्ञापन भी दिए।
    हालांकि इसी बीच एक मुश्किलों भरा दौर भी आया, लेकिन निशांत व रिकांत ने सूझबूझ से काम लेते हुए इसे पार किया और फिर से सफल मुकाम तक पहुंचे।
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